ओवैसी का हमला: “मुस्लिम युवकों की जवानी बर्बाद, पुलिस और मीडिया जिम्मेदार”

ओवैसी का हमला: “मुस्लिम युवकों की जवानी बर्बाद, पुलिस और मीडिया जिम्मेदार”

बंबई हाईकोर्ट ने 2006 मुंबई लोकल ट्रेन धमाकों के सभी 12 दोषियों को बरी किया, सबूत अपर्याप्त और अविश्वसनीय पाए गए।


नई दिल्ली, 21 जुलाई 2025

सोमवार को बंबई हाईकोर्ट ने 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष मामले को साबित करने में “पूरी तरह विफल” रहा था। न्यायमूर्ति अनिल किलोर और श्याम चंदक की पीठ ने विशेष अदालत द्वारा 2015 में दिए गए दोषसिद्धि के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि पेश किए गए सबूतों की कोई ठोस कानूनी वैधता नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष धमाकों में इस्तेमाल हुए बम का प्रकार तक स्पष्ट नहीं कर सका।

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे पुलिस की “पूरी तरह से विफलता” बताया। उन्होंने X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “12 मुस्लिम पुरुषों ने 18 साल जेल में बिताए एक ऐसे जुर्म के लिए जो उन्होंने किया ही नहीं। उनकी जवानी चली गई। वहीं 180 परिवार जिन्होंने अपनों को खोया, उन्हें अब भी न्याय नहीं मिला।” ओवैसी ने कहा कि हाई-प्रोफाइल मामलों में पुलिस पहले ही किसी को दोषी मान लेती है और मीडिया ‘पैरेलल ट्रायल’ चला कर आरोपी को दोषी ठहरा देती है। उन्होंने 2006 में महाराष्ट्र की तत्कालीन सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि आरोपियों द्वारा की गई यातना की शिकायतों को नजरअंदाज किया गया। ओवैसी ने एक आरोपी मोहम्मद माजिद का भी जिक्र किया, जिनकी पत्नी उनकी जेल में रहते हुए गुजर गई।

राजनीतिक प्रतिक्रिया
शिवसेना सांसद मिलिंद देवड़ा, जो 2006 में मुंबई से सांसद थे, ने फैसले पर निराशा जताई। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार से अपील की कि वे सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दें।
भाजपा नेता किरीट सोमैया ने भी फैसले पर निराशा जताते हुए जांच और अभियोजन पक्ष की तैयारियों को कमजोर बताया। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा, “सिर्फ पुलिस की स्वीकारोक्ति के आधार पर इन लोगों को दोषी ठहराया गया और मौत की सजा सुनाई गई। 19 साल की पीड़ा, यातना और जेल — इसका मुआवजा कौन देगा?” विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम ने भी कहा कि राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी।

आरोपियों की ओर से पेश हुए वकील युग चौधरी ने कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह फैसला न केवल न्यायपालिका में, बल्कि मानवता में विश्वास लौटाता है। कोर्ट ने इस पर जवाब दिया, “हमने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई। यही हमारे कर्तव्य का हिस्सा था।”

पूर्व न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर, जो कुछ आरोपियों की ओर से पेश हुए, ने कहा कि यह मामला यह दिखाता है कि आतंकी मामलों में जांच एजेंसियों का रुख अक्सर सांप्रदायिक दृष्टिकोण वाला होता है। गौरतलब है कि विशेष अदालत ने 2015 में 12 में से 5 आरोपियों को मौत की सजा और 7 को उम्रकैद सुनाई थी। 11 जुलाई 2006 को मुंबई की पश्चिमी रेलवे लाइन पर सात स्थानों पर हुए बम धमाकों में 180 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों घायल हुए थे। इस फैसले ने पुलिस जांच की विश्वसनीयता, मीडिया की भूमिका और आतंकी मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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