नई दिल्ली: आज Bollywood की पहचान सिर्फ फिल्मों से नहीं, बल्कि उसके संगीत से भी होती है। किसी भी नई फिल्म की चर्चा उसके गानों के बिना अधूरी मानी जाती है। कई बार फिल्म रिलीज होने से पहले ही उसके गाने सुपरहिट हो जाते हैं और दर्शकों की जुबान पर चढ़ जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि Indian Cinema में पहली बार गाना कब सुनाई दिया था? वह पहला गीत कौन-सा था जिसने दर्शकों को हैरान कर दिया था? और आखिर वह पहला गायक कौन था जिसकी आवाज बड़े पर्दे से सुनाई दी?
इन सवालों के जवाब हमें भारतीय सिनेमा के उस दौर में ले जाते हैं, जब फिल्मों में आवाज नहीं होती थी और कलाकार केवल अपने एक्टिंग के जरिए कहानी सुनाते थे। फिर एक दिन ऐसा आया जिसने भारतीय फिल्मों को बदल दिया।
मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों तक का सफर
Indian Cinema की शुरुआत 1913 में दादासाहेब फाल्के की फिल्म ‘Raja Harishchandra’ से हुई थी। यह एक मूक फिल्म थी, यानी इसमें कोई संवाद या गीत नहीं थे। थिएटर में फिल्म के साथ लाइव संगीत बजाया जाता था ताकि दर्शकों को भावनाओं का एहसास हो सके।
करीब 18 साल तक भारतीय सिनेमा इसी रूप में चलता रहा। लेकिन 1931 में ‘Alam Ara’ फिल्म आई जिसने पहली बार पर्दे पर कलाकारों की आवाज सुनाई। इसी फिल्म के साथ भारतीय सिनेमा ने साउंड युग में प्रवेश किया।
Indian Cinema का पहला फिल्मी गीत कौन-सा था?
14 मार्च 1931 को रिलीज हुई ‘Alam Ara’ भारत की पहली बोलती फिल्म थी। इसी फिल्म में भारतीय सिनेमा का पहला फिल्मी गीत सुनाई दिया।
यह गीत था-
“दे दे खुदा के नाम पर, प्यारे…”
यह गीत सिर्फ एक गाना नहीं था, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास की शुरुआत थी। उस समय दर्शकों के लिए यह अनुभव बिल्कुल नया था। पहली बार उन्होंने बड़े पर्दे पर कलाकार को बोलते और गाते हुए देखा। उस दौर में यह किसी तकनीकी चमत्कार से कम नहीं था।
पहला फिल्मी गायक कौन था?
इस ऐतिहासिक गीत को वज़ीर मोहम्मद खान ने फिल्म में खुद गाया था। उन्होंने फिल्म में एक फकीर का किरदार निभाया था और कैमरे के सामने ही यह गीत प्रस्तुत किया।
उस समय प्लेबैक सिंगिंग की तकनीक नहीं थी। कलाकार खुद एक्टिंग करते थे और खुद ही गाना गाते थे। इसलिए वज़ीर मोहम्मद खान को भारतीय सिनेमा का पहला फिल्मी गायक माना जाता है।
उनकी आवाज ने भारतीय फिल्मों में संगीत की ऐसी परंपरा शुरू की, जो आज दुनिया के सबसे बड़े संगीत उद्योगों में शामिल है।
उस दौर में रिकॉर्डिंग कैसे होती थी?
आज फिल्मों में गानों की रिकॉर्डिंग अत्याधुनिक स्टूडियो में होती है, लेकिन 1930 के दशक में स्थिति बिल्कुल अलग थी।
कलाकारों को कैमरे के सामने ही लाइव गाना पड़ता था। रिकॉर्डिंग के दौरान कैमरा, माइक्रोफोन और कलाकारों की पोजिशन बेहद सावधानी से तय की जाती थी। अगर किसी कलाकार से छोटी-सी भी गलती हो जाती, तो पूरा दृश्य दोबारा शूट करना पड़ता था।
इसी वजह से उस दौर के कलाकारों को अभिनय के साथ-साथ गायन में भी दक्ष होना जरूरी था।
पहली महिला गायिका कौन थीं?
भारतीय फिल्म संगीत के शुरुआती दौर में कई महिला कलाकारों ने अपनी आवाज दी, लेकिन शुरुआती टॉकी फिल्मों की प्रमुख गायिकाओं में जुबैदा, जद्दनबाई और जानकीबाई जैसे नाम महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
बाद के वर्षों में कानन देवी जैसी अभिनेत्री-गायिकाओं ने भी भारतीय फिल्म संगीत को नई पहचान दी।
यह समझना जरूरी है कि शुरुआती दौर में अलग से “प्लेबैक सिंगर” नहीं होते थे। जो अभिनेत्री फिल्म में अभिनय करती थीं, वही अपने गीत भी गाती थीं।
प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत कैसे हुई?
फिल्म संगीत में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब कलाकारों की जगह पेशेवर गायकों की आवाज इस्तेमाल होने लगी।
1935 में आई फिल्म ‘Dhoop Chhaon’ को भारत की पहली फिल्म माना जाता है जिसमें प्लेबैक सिंगिंग का प्रयोग किया गया। इसके बाद फिल्मों में अभिनेता केवल अभिनय करने लगे और गायक स्टूडियो में गीत रिकॉर्ड करने लगे। यहीं से भारतीय फिल्म संगीत का नया दौर शुरू हुआ।
बॉलीवुड में गानों की इतनी अहमियत क्यों है?
दुनिया के कई फिल्म उद्योगों में गाने सिर्फ बैकग्राउंड का हिस्सा होते हैं, लेकिन भारतीय फिल्मों में संगीत कहानी का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है।
एक गीत कई बार वह भाव व्यक्त कर देता है जिसे लंबे संवाद भी नहीं कर पाते। प्रेम, बिछड़ना, खुशी, दर्द, देशभक्ति जैसे हर भावना को भारतीय फिल्मों ने संगीत के जरिए यादगार बनाया है। यही कारण है कि बॉलीवुड के गाने भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय हैं।
तकनीक बदली, लेकिन संगीत की परंपरा नहीं
आज रिकॉर्डिंग डिजिटल स्टूडियो में होती है। डॉल्बी साउंड, AI तकनीक, हाई-एंड मिक्सिंग और अंतरराष्ट्रीय स्तर की रिकॉर्डिंग सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके बावजूद भारतीय फिल्मों में संगीत की अहमियत पहले जैसी ही बनी हुई है।
आज भी किसी फिल्म की सफलता में उसके गानों की बड़ी भूमिका होती है। कई बार दर्शक सिर्फ गानों की वजह से फिल्म देखने थिएटर तक पहुंच जाते हैं।
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भारतीय फिल्म संगीत की सबसे बड़ी विरासत
अगर आज बॉलीवुड को दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म संगीत उद्योग कहा जाता है, तो उसकी शुरुआत उसी छोटे-से गीत से हुई थी जो 1931 में ‘Alam Ara’ के पर्दे पर गूंजा था।
वज़ीर मोहम्मद खान की आवाज से शुरू हुआ यह सफर आज हजारों गायकों, संगीतकारों और करोड़ों संगीत प्रेमियों तक पहुंच चुका है।
आज जब कोई नया बॉलीवुड गीत रिलीज होता है, तो उसके पीछे लगभग एक सदी पुराना वह इतिहास भी जुड़ा होता है, जिसकी शुरुआत एक फकीर के गीत से हुई थी। यही भारतीय सिनेमा की सबसे खूबसूरत विरासत है।
