लाल बहादुर शास्त्री की 122वीं जयंती पर जानें उनके बचपन, गंगा तैरकर स्कूल जाने, मां से रेल मंत्री का पद छिपाने और सादगी से जुड़े चर्चित किस्से
नई दिल्ली: आज देश पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 122वीं जयंती मना रहा है। 2 अक्टूबर का दिन इसलिए भी खास है क्योंकि इसी तारीख को महात्मा गांधी का जन्म हुआ था। शास्त्री जी भारत के दूसरे प्रधानमंत्री रहे, लेकिन उनकी पहचान केवल इस बड़े पद से नहीं बनी।
उनकी जिंदगी से जुड़े कई छोटे-छोटे किस्से आज भी उनकी सादगी और सामान्य जीवन से जुड़े रहने की तस्वीर पेश करते हैं। इनमें एक चर्चित किस्सा यह भी है कि उन्होंने अपनी मां को लंबे समय तक यह नहीं बताया कि वह देश के रेल मंत्री बन चुके हैं। वह उन्हें सिर्फ इतना बताते थे कि वह रेलवे में काम करते हैं।
इसी तरह उनके बचपन से जुड़ी एक लोकप्रिय कहानी में बताया जाता है कि स्कूल जाने के लिए पैसे न होने पर वह गंगा तैरकर पार करते थे। इन कहानियों की हर बारीकी का स्वतंत्र दस्तावेजी प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन ये प्रसंग शास्त्री जी की सार्वजनिक छवि का हिस्सा बन चुके हैं।
गांधी जयंती के दिन हुआ था जन्म
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। यह जगह वाराणसी से कुछ दूरी पर स्थित एक छोटा रेलवे शहर था। उनके पिता शारदा प्रसाद एक स्कूल शिक्षक थे और शास्त्री जी के करीब डेढ़ वर्ष के होने पर उनका निधन हो गया था।
इसके बाद उनकी मां अपने बच्चों के साथ अपने पिता के घर चली गईं। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद शास्त्री जी ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। परिवार में उन्हें प्यार से ‘नन्हे’ कहा जाता था।
प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक जीवनी के अनुसार, बचपन में वह वाराणसी में अपने मामा के साथ रहते थे ताकि आगे की पढ़ाई कर सकें। वह कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते थे और कई बार बिना जूतों के भी उन्हें यह सफर तय करना पड़ता था।
क्या सच में गंगा तैरकर स्कूल जाते थे?
लाल बहादुर शास्त्री से जुड़ा सबसे लोकप्रिय बचपन का किस्सा उनकी गंगा पार करने की कहानी है।
कई संस्मरणों और लोकप्रिय जीवनियों में बताया गया है कि उनके पास नाव का किराया देने के लिए पैसे नहीं होते थे। ऐसे में वह किताबों को सिर के ऊपर रखकर गंगा तैरकर पार करते थे और स्कूल पहुंचते थे।
हालांकि, इस घटना के अलग-अलग संस्करण मिलते हैं और इसकी हर जानकारी को प्राथमिक दस्तावेज से साबित करना मुश्किल है। इसलिए इसे शास्त्री जी के जीवन से जुड़ी लोकप्रिय कहानी के रूप में देखना ज्यादा उचित है।
फिर भी यह प्रसंग उनके बचपन की आर्थिक परिस्थितियों को समझने के लिए अक्सर याद किया जाता है।
‘शास्त्री’ कैसे बना उनका नाम?
लाल बहादुर शास्त्री का मूल नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था। उन्होंने वाराणसी स्थित काशी विद्यापीठ में पढ़ाई की और वहां से शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि मिली।
‘शास्त्री’ का अर्थ विद्वान या शास्त्रों का ज्ञाता होता है। बाद में उन्होंने अपने नाम से ‘श्रीवास्तव’ हटा दिया। इस तरह ‘लाल बहादुर शास्त्री’ ही उनकी सार्वजनिक पहचान बन गई।
16 साल की उम्र में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े
महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान से प्रभावित होकर शास्त्री जी ने कम उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया। इसके बाद वह कई बार जेल भी गए।
स्वतंत्रता के बाद उनका राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव बढ़ता गया। उत्तर प्रदेश सरकार में जिम्मेदारियां संभालने के बाद वह 1951 में केंद्र की राजनीति में आए।
उन्होंने केंद्र में कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। इनमें रेलवे, परिवहन एवं संचार, वाणिज्य एवं उद्योग और गृह मंत्रालय शामिल थे।
रेल मंत्री रहते हुए क्यों दिया इस्तीफा?
रेल मंत्री के तौर पर शास्त्री जी का कार्यकाल उनके सार्वजनिक जीवन के एक महत्वपूर्ण प्रसंग से जुड़ा है।
एक बड़े रेल हादसे के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में स्पष्ट किया था कि शास्त्री जी व्यक्तिगत रूप से हादसे के लिए जिम्मेदार नहीं थे। फिर भी शास्त्री जी ने मंत्री के तौर पर जिम्मेदारी स्वीकार करने का फैसला किया। प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक जीवनी भी उनके इस्तीफे को इसी संदर्भ में दर्ज करती है।
मां से क्यों छिपाई थी मंत्री बनने की बात?
शास्त्री जी से जुड़ा एक बेहद चर्चित किस्सा उनकी मां से जुड़ा है।
कहा जाता है कि जब वह रेल मंत्री बने तो उन्होंने अपनी मां को यह नहीं बताया कि वह केंद्र सरकार में इतने बड़े पद पर हैं। मां को वह सिर्फ इतना बताते थे कि वह रेलवे में काम करते हैं।
लोकप्रिय कहानी के अनुसार, एक बार उनकी मां उनसे मिलने पहुंचीं। उन्हें यह मालूम नहीं था कि उनका बेटा रेलवे मंत्री है। जब उन्होंने अधिकारियों से अपने बेटे ‘लाल’ से मिलने की बात कही और उसका पूरा नाम बताया, तब अधिकारियों को पता चला कि वह रेल मंत्री की मां हैं।
इसके पीछे भी एक वजह बताई जाती है। इस किस्से के अनुसार, शास्त्री जी को डर था कि अगर मां को उनके मंत्री होने का पता चला तो लोग उनसे सिफारिश या मदद के लिए संपर्क कर सकते हैं और मां भी ऐसी मदद के लिए उनसे कह सकती हैं।
यह घटना मुख्य रूप से बाद के संस्मरणों और लोकप्रिय लेखों में मिलती है। इसलिए इसे प्रमाणित सरकारी रिकॉर्ड के बजाय प्रचलित पारिवारिक/मौखिक किस्से के रूप में देखना चाहिए।
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी सादगी नहीं छोड़ी
लाल बहादुर शास्त्री 1964 में जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनके निजी जीवन में सादगी की कई कहानियां सामने आती हैं।
ऐसा ही एक चर्चित प्रसंग कार खरीदने से जुड़ा है। परिवार के लिए कार खरीदने का फैसला हुआ तो बताया जाता है कि कार की कीमत करीब 12,000 रुपये थी, जबकि उनके बैंक खाते में लगभग 7,000 रुपये थे। इसके बाद उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से करीब 5,000 रुपये का कर्ज लिया।
इस घटना का उल्लेख शास्त्री जी के जीवन पर लिखे कई लेखों में मिलता है।
‘जय जवान, जय किसान’ कैसे बना पहचान?
प्रधानमंत्री के रूप में शास्त्री जी को एक साथ कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था और 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध भी हुआ।
खाद्य संकट के दौरान उन्होंने लोगों से सप्ताह में एक दिन एक समय का भोजन छोड़ने की अपील की। बताया जाता है कि उन्होंने पहले अपने परिवार से इसका पालन कराया और फिर देशवासियों से ऐसा करने को कहा।
इसी दौर में उनका प्रसिद्ध नारा ‘जय जवान, जय किसान’ सामने आया। इसमें उन्होंने देश की सुरक्षा करने वाले सैनिक और देश का पेट भरने वाले किसान—दोनों के योगदान को रेखांकित किया।
ताशकंद में हुआ निधन
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद शास्त्री जी पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के साथ बातचीत के लिए ताशकंद गए। 10 जनवरी 1966 को दोनों देशों के बीच ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर हुए।
इसके कुछ ही घंटों बाद 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में शास्त्री जी का निधन हो गया।
उनकी मृत्यु को आधिकारिक तौर पर हृदयाघात से जोड़ा गया। हालांकि, उनकी मृत्यु की परिस्थितियों को लेकर बाद के वर्षों में सवाल और चर्चाएं होती रही हैं। संसद के डिजिटल अभिलेख में शास्त्री जी की मृत्यु के कारणों की जांच के लिए आयोग से संबंधित संसदीय सामग्री भी उपलब्ध है।
इन चर्चाओं के बावजूद किसी वैकल्पिक कारण को तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं। इसलिए शास्त्री जी की मृत्यु से जुड़े दावों को आधिकारिक रिकॉर्ड और बाद की चर्चाओं के बीच अलग-अलग देखना महत्वपूर्ण है।
आज भी क्यों याद किए जाते हैं शास्त्री?
लाल बहादुर शास्त्री की कहानी केवल एक प्रधानमंत्री की राजनीतिक यात्रा नहीं है। उनके जीवन के कई प्रसंग उन्हें आम लोगों के करीब दिखाते हैं।
एक ऐसा बच्चा जिसने कठिन आर्थिक परिस्थितियों में पढ़ाई की, एक स्वतंत्रता सेनानी जिसने जेल यात्राएं कीं, एक मंत्री जिसने रेल हादसे के बाद नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इस्तीफा दिया और एक प्रधानमंत्री जिसने सादगीपूर्ण जीवन जिया—इन सभी रूपों ने उनकी सार्वजनिक छवि बनाई।
2 अक्टूबर को उनकी जयंती महात्मा गांधी की जयंती के साथ मनाई जाती है। लेकिन शास्त्री जी की अपनी पहचान भी उतनी ही विशिष्ट है। उनकी जिंदगी से जुड़े छोटे-छोटे किस्से आज भी यह याद दिलाते हैं कि देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचने के बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन सादगी, जिम्मेदारी और व्यक्तिगत अनुशासन से जुड़ा रहा।
