ज्ञानेश कुमार कौन हैं और SIR विवाद क्या है? जानिए CEC का IAS करियर, नियुक्ति प्रक्रिया, 14 आपत्तियों की रिपोर्ट, ECI का जवाब और इस्तीफे की मांग
नई दिल्ली: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इन दिनों चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। 23 सितंबर की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और निर्देशों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं।
वहीं, चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद कहा कि अलग-अलग राय और आपत्तियां तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था की सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं और SIR समेत आयोग के अंतिम फैसले तीनों आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए।
कौन हैं ज्ञानेश कुमार?
ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के IAS अधिकारी रहे हैं। वह भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त हैं और उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक निर्धारित है। उन्होंने 19 फरवरी 2025 को CEC का पद संभाला था।
कुमार ने IIT कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके अलावा उन्होंने बिजनेस फाइनेंस और पर्यावरण अर्थशास्त्र की भी पढ़ाई की है।
अपने प्रशासनिक करियर की शुरुआत में उन्होंने केरल में कई पदों पर काम किया। इसके बाद वह केंद्र सरकार में आए और रक्षा मंत्रालय तथा गृह मंत्रालय में जिम्मेदारियां संभालीं।
गृह मंत्रालय से चुनाव आयोग तक का सफर
गृह मंत्रालय में कुमार ने जम्मू-कश्मीर से जुड़े मामलों पर काम किया। वह अनुच्छेद 370 से जुड़े फैसलों के कार्यान्वयन और अयोध्या फैसले के बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन से संबंधित काम में भी शामिल रहे।
बाद में उन्होंने संसदीय कार्य मंत्रालय और सहकारिता मंत्रालय में सचिव के रूप में काम किया। जनवरी 2024 में IAS से सेवानिवृत्त होने के बाद मार्च 2024 में उन्हें चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया।
15 मार्च 2024 को ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। इसके बाद 19 फरवरी 2025 को कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त बने।
नए कानून के तहत बने पहले CEC
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति उस नए कानून के तहत हुई, जिसे संसद ने 2023 में पारित किया था।
Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 ने CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली चयन समिति की संरचना में बदलाव किया।
नए कानून के तहत समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित अंतरिम व्यवस्था में भारत के मुख्य न्यायाधीश भी चयन समिति का हिस्सा थे।
कुमार इस नए कानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले CEC हैं। उनकी नियुक्ति के समय विपक्ष की ओर से चयन प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां भी उठाई गई थीं।
14 आपत्तियों की रिपोर्ट में क्या सामने आया?
23 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और निर्देशों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में उन्होंने कहा कि फैसले उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना जारी किए गए थे।
रिपोर्ट में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, वोटर अपील, चुनावी डेटा तक पहुंच और चुनावी सॉफ्टवेयर से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
इनमें से चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज किए जाने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि उपलब्ध रिपोर्टिंग में इन आपत्तियों से ज्ञानेश कुमार द्वारा व्यक्तिगत रूप से किसी गैरकानूनी काम किए जाने का निष्कर्ष स्थापित नहीं होता। रिपोर्ट मुख्य रूप से दो चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों और आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उनकी चिंताओं पर आधारित है।
Form 6 और वोटर डेटा को लेकर क्या विवाद है?
रिपोर्ट के अनुसार, एक प्रमुख मुद्दा Form 6 में बदलाव से जुड़ा था। यह फॉर्म नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होता है।
जांच रिपोर्ट के मुताबिक, SIR प्रक्रिया के दौरान फॉर्म में ऐसा सवाल जोड़ा गया जिसमें आवेदक से उसके या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी के नाम पुराने चुनावी रोल में होने से जुड़ी जानकारी मांगी गई थी।
रिपोर्ट के अनुसार, विवेक जोशी ने इस बदलाव पर आपत्ति जताई और बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी उनका समर्थन किया। संधू ने कथित तौर पर इस बदलाव को “unauthorised and illegal” बताया।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची के डेटाबेस और उसके एक्सेस को लेकर भी सवाल उठाए। रिपोर्ट में चुनावी डेटा के नियंत्रण के दिल्ली में केंद्रीकरण को लेकर उनकी चिंताओं का उल्लेख है।
गोवा और पश्चिम बंगाल से जुड़े मुद्दे
जांच रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में मतदाता अपीलों और गोवा में चुनावी सॉफ्टवेयर से जुड़ी समस्या का भी उल्लेख किया गया है।
गोवा के मामले में रिपोर्ट के अनुसार, दस्तावेजों की जांच के बाद 97 मतदाताओं को पात्र पाया गया, लेकिन सॉफ्टवेयर से जुड़ी समस्या के कारण अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले उनके नाम बहाल नहीं किए जा सके।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों में अपीलों को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।
SIR क्या है और विवाद क्यों बढ़ा?
Special Intensive Revision यानी SIR मतदाता सूची की जांच और अपडेट करने की प्रक्रिया है।
चुनाव आयोग ने 2025 में बिहार से SIR प्रक्रिया शुरू की और बाद में इसे अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया। इस प्रक्रिया में मतदाताओं की जानकारी की दोबारा जांच की जाती है और ऐसे नामों की पहचान की जाती है जिनके बारे में अतिरिक्त सत्यापन की जरूरत हो।
SIR को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस भी हुई है। विपक्षी दलों ने ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम हटने का मुद्दा उठाया है। हालांकि, किसी भी संख्या को गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं की प्रमाणित संख्या के रूप में पेश करना उचित नहीं है।
विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग क्यों की?
रिपोर्ट सामने आने के बाद कई विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की जांच की मांग की।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, MNS प्रमुख राज ठाकरे और अन्य विपक्षी नेताओं ने भी कार्रवाई की मांग की है।
इन नेताओं की आपत्तियां और आरोप राजनीतिक दलों के बयान हैं। इन्हें किसी अदालत या स्वतंत्र जांच की स्थापित निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
CJP ने 48 घंटे में इस्तीफे की मांग की
24 सितंबर को Cockroach Janta Party (CJP) ने ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देने के लिए 48 घंटे का समय दिया।
पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दिपके और अन्य पदाधिकारियों ने नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह मांग रखी। पार्टी ने “Election Commission Thik Karo” नाम से अभियान भी शुरू किया और कहा कि मांग पूरी नहीं होने पर देशव्यापी आंदोलन किया जाएगा।
CJP ने SIR को रोकने, मतदाता सूचियों की समीक्षा और 2023 के नियुक्ति कानून में बदलाव जैसी मांगें भी रखी हैं। ये पार्टी की मांगें हैं, किसी न्यायिक या स्वतंत्र जांच का निष्कर्ष नहीं।
चुनाव आयोग ने क्या जवाब दिया?
चुनाव आयोग ने रिपोर्ट के बाद तीनों आयुक्तों के हस्ताक्षर वाला बयान जारी किया।
ECI ने कहा कि तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय रखना और आपत्तियां दर्ज करना सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के अनुसार, अंतिम फैसले तीनों आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए।
आयोग ने यह भी कहा कि केवल चुनिंदा आंतरिक नोट्स पर ध्यान देने से पूरी प्रक्रिया की तस्वीर सामने नहीं आती। उसके अनुसार, इन नोट्स को आयोग के व्यापक फैसलों और कामकाज के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
आगे क्या हो सकता है?
विपक्ष इस मुद्दे को संसद और सार्वजनिक मंचों पर आगे उठा सकता है। राजनीतिक दल चुनाव आयोग से रिपोर्ट में उठाए गए सवालों पर और स्पष्टीकरण भी मांग सकते हैं।
CEC को पद से हटाने की प्रक्रिया सामान्य इस्तीफे से अलग है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए विशेष संवैधानिक प्रक्रिया लागू होती है।
फिलहाल विवाद का केंद्र चुनाव आयोग के भीतर दर्ज की गई आपत्तियां, मतदाता सूची और SIR की प्रक्रिया है। एक तरफ रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की बार-बार दर्ज आपत्तियों का विवरण सामने आया है, वहीं ECI का कहना है कि ये आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा थे और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
ज्ञानेश कुमार का प्रशासनिक करियर, CEC के रूप में उनकी नियुक्ति और SIR को लेकर चल रहा विवाद आने वाले समय में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर होने वाली बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं।
