‘एकात्म मानव दर्शन’ पर राष्ट्रीय सेमिनार में 100 से अधिक शोध-पत्र, भारतीय विचार पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
अहमदाबाद: गुजरात विश्वविद्यालय ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन और योगदान पर आधारित पुस्तक ‘समर्पण: दीनदयाल उपाध्याय’ के गुजराती संस्करण का विमोचन किया। विश्वविद्यालय के डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी सभागृह में हुए इस कार्यक्रम के साथ ‘एकात्म मानव दर्शन’ पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया।
देशभर के शोधकर्ताओं ने प्रस्तुत किए शोध-पत्र
राष्ट्रीय सेमिनार में देश के विभिन्न राज्यों से आए विद्वानों, चिंतकों और वरिष्ठ प्राध्यापकों ने भाग लिया। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन, विचार और भारतीय चिंतन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।
शोधकर्ताओं ने सेमिनार में 100 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इन शोध-पत्रों ने भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता, राष्ट्रवाद, अर्थनीति और मानव-केंद्रित विकास जैसे विषयों को भी व्यापक चर्चा में शामिल किया।
पुस्तक के लेखक ने रखा प्रकाशन का प्रस्ताव
लेखक चन्दन कुमार ने बताया कि उनकी पुस्तक का भारत की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।
उन्होंने गुजरात विश्वविद्यालय से सेमिनार में प्रस्तुत शोध-पत्रों को प्रकाशित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि शोध-पत्रों का प्रकाशन पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों और एकात्म मानव दर्शन को अधिक व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचा सकता है।
पुरुषोत्तम रूपाला ने भारतीय दृष्टिकोण पर की चर्चा
पूर्व केंद्रीय मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने आधुनिक भारत के चिंतन को महत्वपूर्ण दिशा दी।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के शुरुआती दौर में उपाध्याय ने पश्चिमी राजनीतिक विचारों की सीमाओं को रेखांकित किया और भारतीय दृष्टिकोण पर आधारित एक मौलिक विचार प्रस्तुत किया।
रूपाला ने पश्चिमी विचारधाराओं में मौजूद व्यक्तिवाद, पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद और राष्ट्रवाद का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एकात्म मानव दर्शन व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के बीच संबंध को केंद्र में रखता है।
एकात्म मानव दर्शन में समन्वय पर जोर
रूपाला ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय व्यक्ति और समाज तथा व्यक्ति और राष्ट्र के हितों को एक-दूसरे के विरोध में नहीं रखते। उनके दर्शन में ये हित परस्पर पूरक हैं।
उन्होंने भारतीय दर्शन में संवाद, पारस्परिक स्नेह, विश्व बंधुत्व और वैश्विक एकता जैसे मूल्यों को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि ये मूल्य उपाध्याय के चिंतन में भी दिखाई देते हैं।
कुलपति डॉ. जगदीशभाई जोशी ने किया संबोधित
गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जगदीशभाई जोशी ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने कहा कि देशभर के विद्वानों और वरिष्ठ प्राध्यापकों की भागीदारी गुजरात विश्वविद्यालय के लिए गौरव की बात है।
उन्होंने कहा कि सेमिनार के आगामी सत्रों में प्रस्तुत शोध-पत्रों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि इससे विद्यार्थी पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों और भारतीय दर्शन को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे।
युवा पीढ़ी से भारत 2047 की उम्मीद
डॉ. जोशी ने कहा कि भारतीय चिंतन और मूल्यों से प्रेरित युवा पीढ़ी ‘भारत 2047—श्रेष्ठ भारत, विकसित भारत’ के संकल्प को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
उन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में योगदान देने के लिए प्रो. डॉ. हितेशभाई पटेल और उनकी टीम के साथ विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, विद्यार्थियों और कर्मचारियों का धन्यवाद किया।
भारतीय चिंतन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा
राज्यशास्त्र विभाग ने राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया। कार्यक्रम ने शोधकर्ताओं को पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन पर अपने शोध और विचार प्रस्तुत करने का मंच दिया।
100 से अधिक शोध-पत्रों के माध्यम से भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता, राष्ट्रवाद, अर्थनीति और मानव-केंद्रित विकास जैसे विषयों पर व्यापक अकादमिक विमर्श हुआ।
