नई दिल्ली: जब भी भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार की बात होती है, तो सबसे पहला नाम Devika Rani का सामने आता है। उन्हें भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए वर्ष 1969 में इस पुरस्कार का पहला सम्मान प्राप्त हुआ था। लेकिन देविका रानी की पहचान सिर्फ इस उपलब्धि तक सीमित नहीं है। उन्होंने उस दौर में ऐसे फैसले लिए, जिनकी कल्पना भी करना आसान नहीं था।
1933 में रिलीज हुई उनकी फिल्म ‘Karma’ का लगभग चार मिनट लंबा किसिंग सीन उस समय पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था। उस दौर में जब भारतीय समाज बेहद रूढ़िवादी सोच से घिरा हुआ था, तब इस तरह का दृश्य लोगों के लिए हैरानी का कारण बना। हालांकि समय के साथ यह दृश्य भारतीय सिनेमा के इतिहास का हिस्सा बन गया और देविका रानी को एक ऐसी अभिनेत्री के रूप में याद किया जाने लगा, जिन्होंने परंपराओं से अलग जाकर काम करने का साहस दिखाया।
लेकिन देविका रानी की कहानी सिर्फ एक विवादित दृश्य तक सीमित नहीं है। वह भारतीय फिल्म उद्योग की उन हस्तियों में थीं, जिन्होंने अभिनय के साथ-साथ स्टूडियो संस्कृति, तकनीकी विकास और महिला कलाकारों की पहचान को नई दिशा दी।
भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान की पहली विजेता
Dadasaheb Phalke Award की शुरुआत भारत सरकार ने वर्ष 1969 में की थी। इसका उद्देश्य भारतीय सिनेमा में आजीवन योगदान देने वाले कलाकारों और फिल्मकारों को सम्मानित करना था।
इस सम्मान के लिए पहली बार जिस नाम का चयन किया गया, वह था Devika Rani। यह निर्णय केवल उनके अभिनय को देखते हुए नहीं लिया गया था, बल्कि भारतीय फिल्म उद्योग को मजबूत बनाने में उनके योगदान को भी सम्मानित किया गया।
आज इस पुरस्कार को भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है और हर कलाकार इसे अपने करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है। ऐसे प्रतिष्ठित पुरस्कार की पहली विजेता बनना अपने आप में इतिहास रचने जैसा था।
कला से जुड़ा था बचपन
देविका रानी का जन्म 30 मार्च 1908 को विशाखापट्टनम में हुआ था। उनका परिवार शिक्षित और कला प्रेमी था। शुरुआती पढ़ाई के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चली गईं। लंदन में उन्होंने टेक्सटाइल डिजाइन, थिएटर, अभिनय और स्टेज क्राफ्ट जैसी विधाओं की पढ़ाई की। उस समय बहुत कम भारतीय महिलाएं विदेश जाकर कला की शिक्षा प्राप्त करती थीं।
यही अनुभव बाद में उनके फिल्मी करियर में भी साफ दिखाई दिया। विदेश में रहते हुए उनकी मुलाकात फिल्म निर्माता हिमांशु राय से हुई। दोनों ने विवाह किया और फिर भारतीय सिनेमा को नई दिशा देने के लिए साथ काम करना शुरू किया।
बॉम्बे टॉकीज की स्थापना में निभाई बड़ी भूमिका
भारत लौटने के बाद देविका रानी और हिमांशु राय ने मिलकर Bombay Talkies की स्थापना की थी। यह स्टूडियो भारतीय फिल्म उद्योग के सबसे आधुनिक स्टूडियो में गिना जाता था। उस दौर में फिल्मों का निर्माण सीमित संसाधनों के साथ होता था, लेकिन बॉम्बे टॉकीज ने तकनीकी गुणवत्ता, अभिनय प्रशिक्षण और अनुशासित कार्य संस्कृति को बढ़ावा दिया।
यही से कई बड़े कलाकारों ने अपने करियर की शुरुआत की थी। कहा जाता है कि अशोक कुमार जैसे अभिनेता को फिल्मों में मौका दिलाने में भी देविका रानी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
‘अछूत कन्या’ ने बदली फिल्मों की सोच
देविका रानी की सबसे चर्चित फिल्मों में ‘अछूत कन्या’ (1936) का नाम सबसे पहले लिया जाता है। यह फिल्म जाति व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव जैसे संवेदनशील विषय पर आधारित थी। उस दौर में जब फिल्मों का उद्देश्य केवल मनोरंजन माना जाता था, तब ऐसी कहानी को बड़े पर्दे पर लाना एक साहसिक कदम था।
फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने सराहा। इसके बाद Devika Rani की पहचान सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि सामाजिक सोच रखने वाली कलाकार के रूप में भी बनने लगी।
‘Karma’ और 4 मिनट का किसिंग सीन
देविका रानी के करियर का सबसे चर्चित अध्याय कोई है, तो वह 1933 में रिलीज हुई फिल्म ‘Karma’ है। इस फिल्म में उन्होंने अपने पति हिमांशु राय के साथ एक लंबा किसिंग सीन दिया था। बताया जाता है कि यह दृश्य करीब चार मिनट तक चलता है।
आज के दौर में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन 1930 के दशक में भारतीय फिल्मों में ऐसा दृश्य बेहद असामान्य था। यही वजह रही कि फिल्म रिलीज होते ही इसकी चर्चा पूरे देश में होने लगी। कुछ लोगों ने इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया, जबकि कई फिल्म समीक्षकों ने इसे कहानी की मांग और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रस्तुति का हिस्सा माना।
फिल्म के कुछ संस्करणों में इस दृश्य को छोटा किया गया, लेकिन यह भारतीय सिनेमा के सबसे चर्चित दृश्यों में हमेशा शामिल रहा।
महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा
जब भारतीय समाज में महिलाओं का फिल्मों में काम करना भी आसान नहीं था, तब देविका रानी ने न केवल अभिनय किया बल्कि फिल्म निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी नेतृत्व संभाला। उन्होंने यह साबित किया कि महिलाएं केवल पर्दे पर अभिनय ही नहीं, बल्कि फिल्म उद्योग के संचालन और विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
उनकी सफलता ने आने वाली पीढ़ी की कई अभिनेत्रियों को फिल्मों में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया।
सम्मान और विरासत
1969 में Dadasaheb Phalke Award मिलने के बाद देविका रानी का नाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। इसके बाद यह सम्मान सत्यजीत रे, राज कपूर, लता मंगेशकर, अमिताभ बच्चन, आशा पारेख और मिथुन चक्रवर्ती जैसी कई दिग्गज हस्तियों को भी मिला, लेकिन पहली विजेता होने का गौरव हमेशा देविका रानी के नाम रहेगा।
आज भी फिल्म इतिहास पर चर्चा होती है तो उन्हें भारतीय सिनेमा की “फर्स्ट लेडी ऑफ इंडियन सिनेमा” कहा जाता है।
आज भी क्यों याद की जाती हैं Devika Rani?
देविका रानी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि समय से आगे सोचने वाले लोग ही इतिहास बनाते हैं। उन्होंने अभिनय, फिल्म निर्माण, तकनीक और महिला सशक्तिकरण जैसे कई क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई।
‘Karma’ का विवादित किसिंग सीन हो, ‘अछूत कन्या’ जैसी सामाजिक फिल्म हो या फिर दादासाहेब फाल्के पुरस्कार की पहली विजेता बनने का गौरव हर उपलब्धि ने उन्हें भारतीय सिनेमा का एक अमिट अध्याय बना दिया।
आज, जब भारतीय सिनेमा दुनिया भर में अपनी पहचान बना रहा है, तब Devika Rani का योगदान पहले से भी अधिक महत्वपूर्ण नजर आता है। उन्होंने जिस दौर में सीमित संसाधनों और सामाजिक चुनौतियों के बीच काम किया, उसी ने आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए नए रास्ते खोले। यही वजह है कि उन्हें केवल एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि भारतीय फिल्म उद्योग की आधारशिला रखने वाली अग्रणी हस्तियों में गिना जाता है।
