स्कूलों में अब भगवद् गीता अनिवार्य! शिक्षा में भारतीय संस्कृति का नया अध्याय

स्कूलों में अब भगवद् गीता अनिवार्य! शिक्षा में भारतीय संस्कृति का नया अध्याय

2025-26 से गुजरात में कक्षा 6 से 12 तक भगवद् गीता के श्लोक और सिद्धांत हुआ अब अनिवार्य। उत्तराखंड और हरियाणा भी आगे, NEP 2020 के तहत नैतिक


बच्चों को केवल ‘डिग्री’ के लिए नहीं, बल्कि एक ‘बेहतर इंसान’ और ‘सभ्य नागरिक’ बनने के लिए शिक्षा में भारतीय संस्कृति भगवद् गीता अनिवार्य किया | जापान और जर्मनी जैसे देशों में भी बच्चों को सबसे पहले उनकी संस्कृति और नैतिक मूल्य सिखाए जाते हैं। भारत भी अब उसी रास्ते पर चल रहा है ताकि आने वाली पीढ़ी आधुनिक तो हो, लेकिन उसके संस्कार भारतीय हों। नई शिक्षा नीति (NEP) का लक्ष्य है कि बच्चा शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक—तीनों स्तरों पर मजबूत हो। भारतीय ग्रंथ जीवन जीने की कला को सिखे |


भारत के स्कूलों में भगवद् गीता को शामिल करने का फैसला इन दिनों काफी चर्चा में है। यह कदम केवल किताबों में एक नया चैप्टर जोड़ने जैसा नहीं है, बल्कि इसे बच्चों को अपनी जड़ों और भारतीय मूल्यों से जोड़ने की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।


प्रमुख राज्यों की पहल


• गुजरात: यहाँ 2025-26 के सत्र से कक्षा 6 से 12 तक गीता के सिद्धांतों को अनिवार्य कर दिया गया है। छोटी कक्षाओं में इसे कहानियों के जरिए और बड़ी कक्षाओं में भाषा के विषयों के साथ जोड़कर पढ़ाया जाएगा।
• हरियाणा और उत्तराखंड: इन राज्यों ने भी इसे अपने तरीके से लागू किया है। कहीं प्रार्थना सभाओं में श्लोक पढ़ाए जा रहे हैं, तो कहीं नैतिक शिक्षा की किताबों में इसे खास जगह दी गई है।

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यह बदलाव क्यों किया जा रहा है?

सरकार और शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भगवद् गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि ‘मैनेजमेंट और लाइफ स्किल्स’ की एक गाइड है। इसका उद्देश्य बच्चों को निम्नलिखित बातें सिखाना है:
• कर्तव्य की भावना: “कर्म करो, फल की चिंता मत करो” का सिद्धांत बच्चों को परिणाम के तनाव से बचाकर मेहनत करना सिखाता है।
• मानसिक मजबूती: मुश्किल समय में सही फैसले कैसे लें और खुद पर नियंत्रण कैसे रखें।
• नैतिकता: सही और गलत के बीच फर्क समझना।

NEP 2020 का कनेक्शन

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में इस बात पर काफी जोर दिया गया है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में ‘भारतीयता’ की झलक और संसकृति के बारे में पता होनी चाहिए। यही वजह है कि अब प्राचीन ज्ञान और आधुनिक शिक्षा को मिलाने की कोशिश हो रही है।

चर्चा का दूसरा पहलू

हर बड़े बदलाव की तरह यहाँ भी कुछ सवाल उठ रहे हैं। जहाँ एक पक्ष इसे चरित्र निर्माण के लिए जरूरी मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष यह चिंता जता रहा है कि क्या यह शिक्षा का स्वरूप धार्मिक बना देगा? हालांकि, सरकारों का कहना है कि यह ‘सार्वभौमिक मूल्य’ (Universal Values) सिखाने का जरिया है, जो हर किसी के काम आ सकते हैं।
यह बदलाव भारतीय शिक्षा को एक नया नजरिया देने की कोशिश है, जहाँ किताबी ज्ञान के साथ-साथ जीवन जीने के सलीके पर भी ध्यान दिया जा रहा है। अब असल चुनौती इसे सही तरीके से लागू करने और शिक्षकों को इसके लिए तैयार करने की होगी।

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