संसद में गूंजी डिलीवरी ब्वॉय की आवाज़ , राघव चड्ढा बोले — “10 मिनट में डिलीवरी इंसानों से नहीं ,मशीनों से होती है”

संसद में गूंजी डिलीवरी ब्वॉय की आवाज़ , राघव चड्ढा बोले — “10 मिनट में डिलीवरी इंसानों से नहीं ,मशीनों से होती है”

डिलीवरी ब्वॉय पर 10 मिनट की डिलीवरी का दबाव बढ़ता जा रहा है। राघव चड्ढा ने संसद में उनकी मुश्किलें, खतरे और असुरक्षित हालात पर गंभीर चिंता जताई।

राघव चड्ढा ने बताया आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में हम बस एक क्लिक करते हैं, और कुछ ही मिनटों में खाना, दवा या किराना हमारे दरवाज़े पर पहुंच जाता है। लेकिन इन 10–15 मिनटों के पीछे छुपी उस डिलीवरी ब्वॉय की थकान, डर और संघर्ष शायद ही किसी ने करीब से देखा हो। पहली बार, संसद के अंदर इन अनदेखे हीरो की तकलीफों की आवाज़ गूंजी, जब सांसद राघव चड्ढा ने बताया कि कैसे तेज़ डिलीवरी का यह दबाव उनकी जान और रोज़गार—दोनों को खतरे में डाल रहा है।

10 मिनट का दबाव, और बन रहा है जानलेवा माहौल

आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में 10 मिनट की डिलीवरी सुनने में भले ही सुविधाजनक लगे, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा दर्दनाक है। राघव चड्ढा ने संसद में बताया कि इन कुछ मिनटों का दबाव डिलीवरी ब्वॉय की ज़िंदगी को कितना खतरनाक बना रहा है।
उन्होंने कहा कि जैसे ही डिलीवरी 10 मिनट की लक्ष्मण रेखा को पार कर जाती है, कंपनियां बिना सोचे-समझे उनकी रेटिंग गिरा देती हैं। ऐसा होते ही उनकी कमाई पर गहरा असर पड़ता है, क्योंकि कम रेटिंग का मतलब है कम ऑर्डर, कम इंसेंटिव और कई बार महीना भर पैसे की तंगी। कुछ मामलों में तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। वे समय पर डिलीवरी नहीं कर पाते, तो कई बार उनकी आईडी तक ब्लॉक कर दी जाती है। — यानी अचानक उनकी पूरी कमाई बंद। परिवार की ज़रूरतें, किराया, स्कूल फी—सब एक झटके में संकट में पड़ जाते हैं।

इस दबाव का प्रभाव इतना गहरा है कि हर सेकंड उन्हें डर सताता है—”कहीं देर न हो जाए, कहीं रेटिंग न गिर जाए!” यही डर उन्हें ट्रैफिक नियम तोड़ने पर मजबूर कर देता है। लाल बत्ती पार करना, तेज़ रफ्तार में बाइक दौड़ाना, बारिश और धूप में बिना रुके काम करना—ये सब उनकी मजबूरी बन चुकी है। लेकिन इस दौड़ में उनकी जान हर दिन खतरे में रहती है।

सुरक्षा नहीं, सुविधा नहीं — ज़मीन पर अकेले लड़ते हैं डिलीवरी ब्वॉय
चड्ढा ने संसद में यह कड़वी सच्चाई भी रखी कि इन डिलीवरी ब्वॉयज़ की सुरक्षा को लेकर कंपनियों का रवैया बेहद लापरवाह है। उन्होंने बताया कि कई कंपनियां उन लोगों को बुनियादी सुरक्षा सामान तक उपलब्ध नहीं करातीं—
न हेल्मेट मिलता है, न रेनकोट, न ही कोई मेडिकल सहायता।
बारिश हो या कड़कती धूप, डिलीवरी ब्वॉय अपनी जान जोखिम में डालकर सड़क पर उतरते हैं, लेकिन उन्हें बचाने के लिए कंपनियों के पास कोई ठोस व्यवस्था नहीं होती। अगर अचानक कोई हादसा हो जाए, तो न तो तुरंत इलाज मिलता है और न ही परिवार को कोई आर्थिक सहारा।
चड्ढा ने चिंता जताते हुए कहा कि ये लोग रोज़ाना सैकड़ों किलोमीटर सफर तय करते हैं, लेकिन उनके पास न बीमा की सुरक्षा होती है और न ही किसी आपात स्थिति में मदद का भरोसा। कई बार हादसे के बाद ये लोग अस्पतालों के चक्कर काटते रह जाते हैं, जबकि कंपनियां जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती हैं।
उन्होंने पूछा—
“क्या सिर्फ ग्राहक की सुविधा ही ज़रूरी है? क्या इन युवाओं की ज़िंदगी और सुरक्षा की कोई कीमत नहीं?”

कंपनियां मुनाफे को पहले, कामगारों को बाद में रख रही हैं

चड्ढा ने आरोप लगाया कि आज कई क्विक-कॉमर्स कंपनियां अपने मुनाफे और मार्केटिंग को सबसे ऊपर रखती हैं। वे “10 मिनट डिलीवरी” जैसे बड़े-बड़े दावे करके ग्राहकों को आकर्षित करती हैं, लेकिन इस तेज़ी की असली कीमत डिलीवरी ब्वॉय अपनी जान जोखिम में डालकर चुकाते हैं।
कंपनियां इन कामगारों को “पार्टनर” तो कहती हैं, लेकिन उन्हें किसी कर्मचारी जैसे अधिकार या सुरक्षा नहीं देतीं। न नौकरी की स्थिरता, न बीमा, न ही किसी तरह की गारंटी।
चड्ढा ने कहा कि यह व्यवस्था पूरी तरह अन्यायपूर्ण है—
सारा दबाव और खतरा कामगारों पर, और सारा फायदा कंपनियों का।

सरकार से बड़ी अपील

राघव चड्ढा ने सरकार से आग्रह किया कि गिग वर्कर्स—खासकर डिलीवरी ब्वॉय—की सुरक्षा और अधिकारों को तुरंत ध्यान में लिया जाए। उन्होंने कहा कि:
• 10-मिनट डिलीवरी मॉडल की गंभीर समीक्षा होनी चाहिए
• गिग वर्कर्स के लिए अलग और मजबूत कानून बनाया जाए
इन कामगारों को बुनियादी सुविधाएँ मिलनी चाहिए, जैसे—
• स्वास्थ्य बीमा
• दुर्घटना बीमा
• सामाजिक सुरक्षा
• न्यूनतम वेतन
• सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य माहौल
साथ ही उन्होंने मांग की कि कंपनियों के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि वे अपने डिलीवरी पार्टनर्स को—
• सुरक्षा उपकरण (जैसे हेल्मेट, रेनकोट)
• आराम करने का पर्याप्त समय
• स्पष्ट और पारदर्शी काम की नीतियाँ
मौजूद कराएँ।
चड्ढा ने भावुक अपील करते हुए कहा:
“ये कामगार हमारे लिए दौड़ते हैं, अब हमारी बारी है इनके लिए खड़े होने की।”
और आगे कहा—
“जब हम घर बैठे खाना, किराना या दवा मंगाते हैं, तो सबसे पहले ये ही लोग हमारी मदद करते हैं। आज ज़रूरत है कि हम उनकी आवाज़ बनें।”

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