दिल्ली की संगीत परंपरा के आधार स्तंभ और हजारों कलाकारों के प्रेरणास्रोत ‘गुरुजी’ को शिष्यों व परिवार ने सुरों के माध्यम से दी श्रद्धांजलि
17 मई 2025, नई दिल्ली
भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले महान गुरु और संस्कारों के प्रतीक, स्वर्गीय हीरालाल चतुर्वेदी जी की 48वीं पुण्यतिथि पर आज राजधानी में भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। संगीत जगत में ‘गुरुजी’ के नाम से विख्यात इस दिव्य व्यक्तित्व को उनके शिष्यों, परिजनों और संगीत प्रेमियों ने श्रद्धा से स्मरण किया।
राजस्थान के भरतपुर जिले के ताखा गांव में जन्मे चतुर्वेदी जी ने 1914 में दिल्ली आकर अपने जीवन को संगीत साधना और शिक्षण को समर्पित कर दिया। उन्होंने पुरानी दिल्ली में एक संगीत विद्यालय की स्थापना की, जहाँ से हजारों विद्यार्थियों ने शास्त्रीय संगीत की बारीकियाँ सीखीं। इनमें से कई आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय संगीत का परचम लहरा रहे हैं।
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गुरुजी की विरासत:
उनके सुपुत्र और ‘राष्ट्र टाइम्स’ के संपादक विजय शंकर चतुर्वेदी ने कहा,
“बाबूजी की विरासत सिर्फ संगीत तक सीमित नहीं रही, उन्होंने समाज को संस्कृति, अनुशासन और मूल्यों की विरासत भी सौंपी है।”
इस अवसर पर उनके पुराने संगीत विद्यालय में एक विशेष सभा का आयोजन हुआ, जहां शिष्यों ने गुरुजी को रागों की प्रस्तुति के माध्यम से नमन किया। हर सुर में गुरुजी की याद और उनका आशीर्वाद झलकता रहा।
हीरालाल चतुर्वेदी जी जैसे साधक सदियों में एक बार जन्म लेते हैं। उनका जीवन, उनकी शिक्षाएं और उनका समर्पण आज भी अनगिनत कलाकारों के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है। भारतीय संगीत समुदाय उन्हें सदैव कृतज्ञता के साथ याद करता रहेगा।
