Jaishankar on Israel-Iran conflict:इजरायल-ईरान तनाव पर एस. जयशंकर ने भारत की संतुलित नीति स्पष्ट की, कहा—राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीति सर्वोपरि।
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया इन दिनों आग की लपटों में है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। ऐसे में भारत की विदेश नीति पर सवाल उठने लगे — क्या भारत इजरायल के पक्ष में खड़ा है? ईरान पर चुप क्यों है? विपक्ष ने संसद में यही सवाल उठाए।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न सिर्फ भारत-इजरायल की दोस्ती की गहराई बताई, बल्कि ईरान पर भारत के संयमित रुख के पीछे की हर वजह भी एक-एक कर गिनाई हैं ।
जब-जब युद्ध हुआ, इजरायल ने साथ दिया
जयशंकर ने पहले इजरायल के साथ रिश्ते की मजबूती को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि भारत के कई सैन्य संघर्षों में इजरायल ने हथियार, गोला-बारूद, खुफिया जानकारी और तकनीकी मदद दी है। 1971 के युद्ध से लेकर 1999 के कारगिल संघर्ष तक — इजरायल हर बार भारत के साथ खड़ा रहा।
उन्होंने इस दोस्ती को महज कूटनीतिक नहीं, बल्कि “गहरी और रणनीतिक” बताया। आतंकवाद के खिलाफ साझा चिंता, रक्षा तकनीक, कृषि और व्यापार — इन सभी मोर्चों पर भारत-इजरायल के रिश्ते मजबूत हुए हैं। जयशंकर का संदेश साफ था: यह रिश्ता एकतरफा नहीं है, इजरायल ने जरूरत के वक्त साथ दिया है।
ईरान पर ‘चुप्पी’ का जवाब — एक-एक वजह
विपक्ष का सबसे बड़ा सवाल था कि ईरान में हो रही घटनाओं पर भारत की प्रतिक्रिया इतनी मौन क्यों है। जयशंकर ने हर सवाल का जवाब तथ्यों के साथ दिया।
राष्ट्रीय हित सबसे पहले (National Interest First)
भारत के ईरान के साथ पुराने और जरूरी रिश्ते हैं — तेल आयात, चाबहार बंदरगाह जैसे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट और हजारों भारतीयों का वहां रहना। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जंग भड़कने से ऊर्जा सुरक्षा खतरे में आती है — और यही वजह है कि भारत हर कदम सोच-समझकर उठा रहा है।
मानवीय मदद से पीछे नहीं हटे (Did not back down from providing humanitarian aid)
मार्च 2026 की शुरुआत में ईरान का नौसैनिक जहाज IRIS लावान को कोच्चि में डॉक करने की इजाजत दी गई — मानवीय आधार पर। जहाज पर सवार क्रू, जिनमें युवा कैडेट भी थे, को शरण दी गई। जयशंकर ने इसे “सही काम” बताया। यह मौन नहीं, यह मानवीयता थी।
सक्रिय कूटनीति जारी रही (Active diplomacy continued)
जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत चुप नहीं बैठा। उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची और इजरायल के विदेश मंत्री दोनों से बातचीत की। ईरान में फंसे भारतीय नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने की कोशिशें भी जारी रहीं।
दलाल नहीं, स्वतंत्र नीति (No Middlemen—An Independent Policy)
पाकिस्तान द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश पर तंज कसते हुए जयशंकर ने कहा — “भारत दलाल देश नहीं है।” उन्होंने कहा कि पाकिस्तान 1981 से यह भूमिका निभाता आ रहा है, भारत नहीं। भारत की नीति अपने हितों पर आधारित है, किसी और के एजेंडे पर नहीं।
‘मल्टी-अलाइनमेंट'(Multi-alignment) — भारत की असली ताकत
जयशंकर का पूरा बयान दरअसल भारत की उस विदेश नीति की व्याख्या था जिसे ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ कहते हैं। इजरायल और अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी, ईरान के साथ ऊर्जा और व्यापारिक संबंध, और किसी भी खेमे में पूरी तरह शामिल हुए बिना शांति की पैरोकारी — यही भारत का रास्ता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत कई विश्व नेताओं से बात कर संघर्ष के जल्द समाधान का आग्रह किया है।
पश्चिम एशिया का संकट भारत के लिए सिर्फ एक विदेश नीति की परीक्षा नहीं है — यह ऊर्जा, व्यापार, और करोड़ों भारतीयों की सुरक्षा का सवाल भी है। जयशंकर ने संसद में यह साफ कर दिया कि भारत न किसी का दबाव मानता है, न किसी का दलाल बनता है। इजरायल की दोस्ती निभाना और ईरान से संवाद जारी रखना — दोनों एक साथ हो सकते हैं। और यही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की असली पहचान है।
