सुप्रीम कोर्ट ने BCCI से पूछा कि नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट 2025 उस पर लागू क्यों नहीं होना चाहिए
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) को लेकर अहम सवाल उठाया है। कोर्ट ने पूछा है कि नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट, 2025 BCCI पर क्यों लागू नहीं होना चाहिए।
कोर्ट ने BCCI से अपना पक्ष रखने को कहा है। उसने सभी राज्य क्रिकेट संघों से भी जवाब मांगा है।
तीन जजों की पीठ ने मंगलवार, 8 सितंबर को यह सवाल उठाया। पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने की। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी पीठ में शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट में BCCI से जुड़े लंबे समय से चल रहे मामले की सुनवाई हुई। राज्य क्रिकेट संघों और उनके सदस्यों ने नई अर्जियां दाखिल की थीं।
कुछ अर्जियों में क्रिकेट संघों के संविधान में बदलाव की मांग की गई है। वहीं, कुछ मामलों में नियंत्रण और प्रशासन से जुड़े विवाद हैं।
सुप्रीम कोर्ट एक दशक से अधिक समय से BCCI से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा है। ऐसे में कोर्ट का ताजा सवाल भारतीय क्रिकेट प्रशासन पर बड़ा असर डाल सकता है।
कोर्ट ने BCCI से क्या पूछा?
सुप्रीम कोर्ट ने BCCI और राज्य क्रिकेट संघों से अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा है।कोर्ट जानना चाहता है कि नया खेल कानून इन क्रिकेट संस्थाओं पर लागू क्यों नहीं होना चाहिए।
जजों ने एक और अहम सवाल उठाया। उन्होंने वकीलों से अपने पक्षकारों से निर्देश लेने को कहा। कोर्ट यह भी जानना चाहता है कि पदाधिकारियों का कार्यकाल इस कानून के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है।
नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट के कई प्रावधान पहले ही लागू हो चुके हैं। सरकार ने इस कानून को चरणबद्ध तरीके से लागू किया है।कई प्रावधान 1 जनवरी 2026 से लागू हुए थे। हालांकि, BCCI की कानूनी स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।
कोर्ट ने फिलहाल केवल जवाब मांगा है। उसने यह तय नहीं किया है कि कानून BCCI या राज्य क्रिकेट संघों पर लागू होगा या नहीं।
2014 से क्यों जारी है BCCI का मामला?
सुप्रीम कोर्ट का BCCI के मामलों में दखल 2014 में शुरू हुआ था।
बाद में कोर्ट ने क्रिकेट प्रशासन में बड़े सुधारों की दिशा में कदम उठाए। उसने पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर. एम. लोढ़ा की अध्यक्षता में एक समिति भी बनाई।
लोढ़ा समिति ने BCCI के कामकाज की समीक्षा की। समिति ने क्रिकेट प्रशासन में कई सुधारों की सिफारिश की।इन सुधारों का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना था। साथ ही, सत्ता के केंद्रीकरण को रोकना भी इसका लक्ष्य था।
सुप्रीम कोर्ट ने समिति की कई सिफारिशों को स्वीकार किया। इसके बाद कोर्ट ने इनके लागू होने की निगरानी की।2017 में कोर्ट ने कमेटी ऑफ एडमिनिस्ट्रेटर्स को नया BCCI संविधान तैयार करने का निर्देश दिया।
BCCI और राज्य क्रिकेट संघों ने इस प्रक्रिया में हिस्सा लिया। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2018 में नए संविधान को मंजूरी दी।बाद में BCCI ने इस संविधान को तमिलनाडु के रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज के पास पंजीकृत कराया।
इसके बाद भी BCCI से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट में आते रहे। राज्य क्रिकेट संघों ने चुनाव, संविधान में बदलाव और पदाधिकारियों के कार्यकाल से जुड़े मुद्दों पर अर्जियां दाखिल कीं।
इनमें क्रिकेट संस्थाओं के नियंत्रण को लेकर विवाद भी शामिल रहे।यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट का ताजा सवाल काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
BCCI का कूलिंग-ऑफ पीरियड क्या है?
BCCI में पदाधिकारियों का कार्यकाल लंबे समय से विवाद का विषय रहा है।पहले नियम के अनुसार, लगातार दो तीन-वर्षीय कार्यकाल पूरे करने के बाद तीन साल का ब्रेक लेना जरूरी था।
इस अवधि में पदाधिकारी क्रिकेट प्रशासन से दूर रहता था। इसके बाद वह दोबारा किसी पद के लिए दावेदारी कर सकता था।सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को कूलिंग-ऑफ पीरियड कहा था।
इस नियम का उद्देश्य पदाधिकारियों को लंबे समय तक सत्ता में बने रहने से रोकना था। इससे नए लोगों को क्रिकेट प्रशासन में मौका मिलने की उम्मीद थी।
यह नियम राज्य क्रिकेट संघों और BCCI दोनों पर लागू होता था। राज्य स्तर और BCCI स्तर के बीच पद बदलने पर भी इसका असर पड़ सकता था।
सितंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों में बदलाव किया।नई व्यवस्था के तहत राज्य स्तर पर छह साल और BCCI स्तर पर छह साल का कार्यकाल संभव हुआ।
इससे कुल 12 साल तक का कार्यकाल संभव हो गया। इसके बाद कूलिंग-ऑफ पीरियड लागू हो सकता था। BCCI ने पहले की व्यवस्था में बदलाव की मांग की थी। बोर्ड का तर्क था कि पुराने नियम के कारण कूलिंग-ऑफ पीरियड जल्दी लागू हो सकता है।
कूलिंग-ऑफ पीरियड का मुद्दा आज भी महत्वपूर्ण है। नए खेल कानून में भी खेल संस्थाओं और पदाधिकारियों के लिए कई नियम हैं।
BCCI नए खेल कानून का विरोध क्यों करता रहा है?
BCCI लंबे समय से खुद को एक स्वायत्त निजी संस्था बताता रहा है।बोर्ड तमिलनाडु सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत है।
BCCI ने कई कानूनी मामलों में अपनी इसी स्थिति का हवाला दिया है। बोर्ड ने अपने कामकाज में सरकार के व्यापक नियंत्रण का विरोध किया है।
BCCI का यह भी कहना रहा है कि उसे सरकारी फंड नहीं मिलता। यह मुद्दा पहले RTI से जुड़े विवादों में भी सामने आया है।
BCCI ने खुद को सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण माने जाने का विरोध किया है। 2026 में केंद्रीय सूचना आयोग के एक फैसले में भी यह कानूनी विवाद दर्ज हुआ था। एक अन्य मुद्दा ‘डिजिग्नेटेड स्पोर्ट’ से जुड़ा है।
नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट में सरकार की अधिसूचना के जरिए डिजिग्नेटेड स्पोर्ट को परिभाषित किया गया है। BCCI का तर्क रहा है कि इस व्यवस्था के तहत क्रिकेट को औपचारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया गया है।
इसी आधार पर बोर्ड ने सवाल उठाया है कि यह कानून उस पर अपने आप कैसे लागू हो सकता है। अब सुप्रीम कोर्ट को इन तर्कों पर विचार करना है। कोर्ट को नए खेल कानून के व्यापक दायरे की भी समीक्षा करनी होगी।
अगर BCCI कानून के दायरे में आया तो क्या होगा?
नया कानून नेशनल स्पोर्ट्स ट्रिब्यूनल बनाने का प्रावधान करता है। यह ट्रिब्यूनल खेलों से जुड़े कुछ विवादों की सुनवाई करेगा। इससे खेल संगठनों और खिलाड़ियों को एक विशेष मंच मिल सकेगा।
कानून कुछ मामलों में ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की अनुमति भी देता है। ट्रिब्यूनल को संबंधित मामलों में सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां मिलेंगी।
सरकार ने इस नई व्यवस्था पर काम शुरू कर दिया है।जून 2026 में युवा मामले और खेल मंत्रालय ने ट्रिब्यूनल के सदस्यों के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे।ट्रिब्यूनल का मुख्यालय नई दिल्ली में है।
अगर BCCI इस कानून के दायरे में आता है, तो क्रिकेट से जुड़े कुछ विवाद ट्रिब्यूनल के सामने जा सकते हैं।ऐसे मामलों का रास्ता सुप्रीम कोर्ट तक पहले की तरह नहीं पहुंच सकता है।
कानून में लंबित मामलों को लेकर भी प्रावधान हैं।यह BCCI के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से क्रिकेट बोर्ड से जुड़े मामलों की सुनवाई करता रहा है।हालांकि, इसका वास्तविक असर अभी स्पष्ट नहीं है। पहले सुप्रीम कोर्ट को संबंधित कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करनी होगी।
National Sports Governance Act 2025: मुख्य बातें
नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस बिल, 2025 को 23 जुलाई 2025 को लोकसभा में पेश किया गया था।
खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने यह बिल पेश किया।लोकसभा ने 11 अगस्त को इसे पारित किया। राज्यसभा ने 12 अगस्त को बिल को मंजूरी दी।राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 18 अगस्त 2025 को इसे मंजूरी दी।इसके बाद यह नेशनल स्पोर्ट् गवर्नेंस एक्ट, 2025 बन गया।
इस कानून का उद्देश्य भारत में खेल प्रशासन को बेहतर बनाना है।यह कानून सुशासन और नैतिक मानकों पर जोर देता है। इसमें निष्पक्ष खेल और खिलाड़ियों के कल्याण से जुड़े प्रावधान भी हैं। कानून खेल विवादों के समाधान के लिए एक नया ढांचा तैयार करता है।
सरकार ने पूरे कानून को एक साथ लागू नहीं किया। इसके बजाय, अलग-अलग प्रावधान चरणबद्ध तरीके से लागू किए गए। कई प्रावधान 1 जनवरी 2026 से प्रभावी हुए। यह कानून नेशनल स्पोर्ट्स बोर्ड बनाने का भी प्रावधान करता है।
इसमें मान्यता प्राप्त खेल संगठनों के लिए कई नियम हैं। इनमें चुनाव, नैतिकता, सुरक्षित खेल नीतियां, खातों और ऑडिट से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। इन प्रावधानों के कारण BCCI की कानूनी स्थिति को लेकर सवाल फिर उठे हैं।
BCCI के लिए आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस मामले पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। BCCI और राज्य क्रिकेट संघों को अब कोर्ट के सवालों का जवाब देना होगा।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट उनके तर्कों पर विचार करेगा। कोर्ट BCCI की स्वायत्त स्थिति और उसकी कानूनी संरचना की समीक्षा करेगा। वह नए खेल कानून के दायरे को भी देखेगा। इसमें क्रिकेट की स्थिति एक अहम मुद्दा होगी।
अंतिम फैसला BCCI के प्रशासनिक ढांचे को बदल सकता है। इससे बोर्ड के लिए नए जवाबदेही नियम भी लागू हो सकते हैं।नेशनल स्पोर्ट्स ट्रिब्यूनल की व्यवस्था से क्रिकेट विवादों के कानूनी रास्ते में भी बदलाव आ सकता है।
इससे सुप्रीम कोर्ट पर BCCI से जुड़े मामलों का बोझ कम हो सकता है। फिलहाल, कोर्ट ने केवल स्पष्टीकरण मांगा है। उसने BCCI को नए खेल कानून से छूट देने पर कोई अंतिम फैसला नहीं किया है। अब अगली सुनवाई और BCCI तथा राज्य क्रिकेट संघों के जवाब महत्वपूर्ण होंगे।
