1999 में CRPF से बर्खास्त हुए गिरवर सिंह तोमर ने मंदिर में बिताए साल, ‘गिरवर दास महाराज’ के नाम से मिली पहचान; 2026 में फिर मिली फोर्स में जगह
नई दिल्ली/भोपाल: कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जिन्हें सुनकर पहली नजर में यकीन करना मुश्किल लगता है। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के रहने वाले गिरवर सिंह तोमर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कभी CRPF में हवलदार रहे गिरवर सिंह को 1999 में एक विभागीय विवाद के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया और करीब 27 साल तक अपनी लड़ाई जारी रखी।
इस लंबे संघर्ष के दौरान उनकी जिंदगी ने पूरी तरह अलग मोड़ ले लिया। नौकरी जाने के बाद वह मंदिरों में रहने लगे और धीरे-धीरे साधु जीवन अपना लिया। इसी दौरान उनकी पहचान ‘गिरवर दास महाराज’ के रूप में बनने लगी।
हालांकि उन्होंने आध्यात्मिक जीवन अपना लिया था, लेकिन CRPF में दोबारा लौटने की उम्मीद कभी नहीं छोड़ी।
अगस्त 2026 में उनकी वर्षों पुरानी लड़ाई आखिरकार पूरी हुई। 54 साल की उम्र में गिरवर सिंह तोमर ने एक बार फिर CRPF की खाकी वर्दी पहनी। उन्हें छत्तीसगढ़ के बीजापुर स्थित CRPF की 85वीं बटालियन में तैनाती मिली।
1991 में शुरू हुआ था CRPF का सफर
गिरवर सिंह तोमर ने 1991 में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी CRPF में भर्ती होकर अपने करियर की शुरुआत की थी। उन्होंने हवलदार के तौर पर सेवा दी और करीब आठ साल तक फोर्स में काम किया।
उनका करियर सामान्य तरीके से आगे बढ़ रहा था, लेकिन 1999 में एक घटना ने सब कुछ बदल दिया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, असम में तैनाती के दौरान एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ उनका विवाद हुआ था। मामला कथित तौर पर एक साइकिल से जुड़ा था। आरोप था कि गिरवर सिंह की साइकिल अधिकारी की गाड़ी से टकरा गई थी। हालांकि, गिरवर सिंह ने इस आरोप से इनकार किया और कहा कि उनकी साइकिल ने वाहन को छुआ तक नहीं था।
विवाद बढ़ने के बाद उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई।
21 अक्टूबर 1999 को गिरवर सिंह तोमर को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इस फैसले ने उनके करियर और निजी जिंदगी दोनों को गहरा झटका दिया।
CRPF की बैरक से मंदिर तक पहुंची जिंदगी
नौकरी जाने के बाद गिरवर सिंह अपने गांव चिच्छावली लौट आए। अचानक वर्दी और नौकरी से दूर हो जाना उनके लिए आसान नहीं था।
धीरे-धीरे उनका झुकाव आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ने लगा। उन्होंने अपने गांव के पास स्थित बारहद्वारी मंदिर में रहना शुरू किया। वहां उन्होंने कई साल पूजा-पाठ, सेवा और साधना में बिताए।
इसके बाद वह मुरैना के गुफा मंदिर पहुंचे। यहीं उनकी जिंदगी ने एक और नया रूप लिया। उन्होंने साधु का जीवन अपना लिया और ‘बाबा गिरवर दास’ या ‘गिरवर दास महाराज’ के नाम से पहचाने जाने लगे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 2001 में उनका संबंध निर्मोही अखाड़े से भी जुड़ा। मंदिर में रहते हुए उनका अधिकांश समय पूजा, ध्यान और सेवा में बीतने लगा।
उनके लंबे बाल और बढ़ी हुई सफेद दाढ़ी उनकी नई पहचान बन गई। खाकी वर्दी की जगह उन्होंने भगवा और सरसों रंग के वस्त्र पहनने शुरू कर दिए।
लेकिन इस बदली हुई पहचान के पीछे एक पूर्व CRPF जवान अब भी अपनी नौकरी वापस पाने की लड़ाई लड़ रहा था।
साधु बने, लेकिन अदालत की लड़ाई नहीं छोड़ी
साधु जीवन अपनाने के बावजूद गिरवर सिंह ने अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखी।
उन्होंने 1999 में ही अपनी बर्खास्तगी को अदालत में चुनौती दी थी। वर्षों की कानूनी प्रक्रिया के बाद 2007 में उन्हें एक बड़ी राहत मिली। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया।
अदालत ने माना कि लगाए गए आरोपों की स्थिति में भी बर्खास्तगी जैसी सजा बहुत कठोर थी।
हालांकि, इस फैसले के बाद भी उनकी नौकरी तुरंत वापस नहीं मिली। केंद्र सरकार और CRPF ने इस फैसले को चुनौती दी और मामले में आगे कानूनी प्रक्रिया जारी रही।
इस तरह गिरवर सिंह की जिंदगी दो अलग-अलग रास्तों पर एक साथ चलती रही। एक तरफ वह मंदिर में साधु के रूप में सेवा और साधना करते थे, वहीं दूसरी तरफ जरूरत पड़ने पर अपनी कानूनी लड़ाई आगे बढ़ाते रहे।
27 साल तक चलता रहा इंतजार
गिरवर सिंह तोमर के लिए समय गुजरता रहा, लेकिन उनकी उम्मीद खत्म नहीं हुई।
वह मंदिरों में रहते रहे, परिवार से संपर्क बनाए रखा और अपनी कानूनी लड़ाई भी जारी रखी। इतने लंबे समय में उनकी जिंदगी के कई पड़ाव बदल गए। बाल सफेद हो गए, दाढ़ी लंबी हो गई और CRPF की वर्दी उनकी जिंदगी की पुरानी याद बन गई।
लेकिन उन्होंने यह विश्वास नहीं छोड़ा कि एक दिन उन्हें फिर से अपना अधिकार मिलेगा।
उनका आध्यात्मिक जीवन उन्हें मानसिक मजबूती देता रहा, जबकि अदालत का मामला उन्हें अपनी पुरानी जिंदगी वापस पाने की उम्मीद देता रहा।
2025 के कोर्ट आदेश से मिली बड़ी राहत
गिरवर सिंह की लंबी कानूनी लड़ाई में सबसे बड़ा मोड़ अगस्त 2025 में आया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें सेवा में वापस लेने का निर्देश दिया। अदालत ने अधिकारियों को निर्धारित समय के भीतर उनकी बहाली करने को कहा।
लेकिन अदालत के आदेश के बाद भी उनकी वापसी तुरंत नहीं हो सकी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, 26 साल से ज्यादा पुराने मामले से जुड़े रिकॉर्ड तलाशने और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करने में समय लगा। गिरवर सिंह ने भी मामले को आगे बढ़ाते हुए अधिकारियों को कानूनी नोटिस भेजे और आदेश लागू कराने की कोशिश जारी रखी।
आखिरकार करीब एक साल बाद उनकी बहाली का रास्ता साफ हुआ।
26 अगस्त 2026: फिर से पहनी CRPF की खाकी
गिरवर सिंह की जिंदगी का सबसे भावुक दिन 26 अगस्त 2026 को आया।
बहाली का आदेश मिलने के बाद वह मुरैना से बीजापुर के लिए रवाना हुए। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने 25 अगस्त की रात ट्रेन पकड़ी और अगले दिन सुबह बीजापुर पहुंचे।
लेकिन ड्यूटी ज्वाइन करने से पहले उन्होंने एक ऐसा काम किया, जिसने उनकी जिंदगी के दो अलग-अलग अध्यायों को जोड़ दिया।
वह सीधे नाई की दुकान पहुंचे।
कई वर्षों से उनकी पहचान बन चुके लंबे बाल और सफेद दाढ़ी काट दी गई। भगवा वस्त्र उतारकर उन्होंने एक बार फिर CRPF की खाकी वर्दी पहन ली।
कुछ ही घंटों में ‘बाबा गिरवर दास’ की जगह पूर्व CRPF जवान गिरवर सिंह तोमर फिर से वर्दी में नजर आए।
दोपहर तक उन्होंने औपचारिक रूप से अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर ली।
हवलदार से कांस्टेबल तक, लेकिन हौसला वही
गिरवर सिंह की CRPF में वापसी पुराने पद पर नहीं हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लंबे अंतराल के बाद उन्हें कांस्टेबल के पद पर बहाल किया गया और छत्तीसगढ़ के बीजापुर स्थित 85वीं बटालियन में तैनात किया गया।
लंबे समय तक सेवा से बाहर रहने के कारण उन्हें आवश्यक ट्रेनिंग और निर्धारित कोर्स पूरे करने होंगे। इसके बाद ही आगे की पदोन्नति की प्रक्रिया हो सकेगी।
इसका मतलब है कि उनकी वापसी सिर्फ पुरानी नौकरी में लौटना नहीं है। उन्हें ऐसे संगठन में नए सिरे से शुरुआत करनी होगी, जो 1999 के मुकाबले आज काफी बदल चुका है।
उनके पुराने बैच के ज्यादातर साथी या तो रिटायर हो चुके हैं या सेवा में नहीं हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके पुराने बैच के केवल एक-दो लोग ही अब फोर्स में बचे हैं।
फिर भी नई यूनिट में उनका स्वागत हुआ और उन्होंने इसे अपने लिए घर लौटने जैसा बताया।
“ऐसा लग रहा है जैसे घर वापस आ गया हूं”
ड्यूटी पर लौटने के बाद गिरवर सिंह ने अपनी जीत का श्रेय भगवान की कृपा को दिया।
उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे वह अपने घर वापस लौट आए हों।
27 साल की कानूनी लड़ाई के बाद उनकी वापसी सिर्फ नौकरी मिलने की कहानी नहीं है। यह उस व्यक्ति की कहानी है, जिसने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा इंतजार में बिताया, लेकिन उम्मीद नहीं छोड़ी।
1991 में CRPF में भर्ती होने से लेकर 1999 में बर्खास्तगी और 2026 में वापसी तक करीब 35 साल का लंबा सफर पूरा हो चुका है।
साधु का जीवन उनकी सैनिक पहचान पर भारी नहीं पड़ा
गिरवर सिंह की कहानी को खास बनाता है उनका साधु जीवन।
उन्होंने 27 साल सिर्फ अदालत के फैसले का इंतजार करते हुए नहीं बिताए। इस दौरान उन्होंने अपनी जिंदगी को एक बिल्कुल अलग दिशा दी।
‘गिरवर दास महाराज’ के रूप में उन्होंने मंदिरों में सेवा की, पूजा-पाठ किया और आध्यात्मिक जीवन अपनाया। वहीं, दूसरी ओर उन्होंने अपनी पुरानी नौकरी वापस पाने के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाना जारी रखा।
यानी उनकी जिंदगी में साधु और सैनिक की दो पहचान एक साथ चलती रहीं।
अब जब वह फिर से CRPF में लौट चुके हैं, तो उनका साधु जीवन भी उनकी इस असाधारण यात्रा का अहम हिस्सा बना रहेगा।
गिरवर सिंह की कहानी क्यों खास है?
गिरवर सिंह तोमर की कहानी सिर्फ एक जवान के साधु बनने और फिर वर्दी में लौटने की कहानी नहीं है।
यह लंबे समय तक चलने वाली कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के असर को भी दिखाती है। 1999 की एक विभागीय कार्रवाई ने उनके करियर की दिशा बदल दी। इसके बाद अदालत में मामला वर्षों तक चलता रहा।
यहां तक कि उनके पक्ष में फैसला आने के बाद भी उन्हें आदेश लागू होने का इंतजार करना पड़ा।
उनकी कहानी यह भी बताती है कि किसी व्यक्ति को न्याय पाने के लिए कितनी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने अपनी आध्यात्मिक जिंदगी को अपनाने के बावजूद अपने कानूनी अधिकार की लड़ाई नहीं छोड़ी।
खाकी से भगवा और फिर खाकी तक का सफर
गिरवर सिंह तोमर की कहानी एक ऐसे सफर की तरह है, जिसकी शुरुआत खाकी वर्दी से हुई और अंत भी खाकी वर्दी में हुआ।
बीच के 27 वर्षों में उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। CRPF की बैरक से मंदिर तक का सफर तय करते हुए वह साधु बने। लंबे बाल, सफेद दाढ़ी और भगवा वस्त्र उनकी पहचान बन गए।
लेकिन उनके भीतर एक सैनिक हमेशा जिंदा रहा।
अगस्त 2026 में जब उन्होंने लंबे बाल और दाढ़ी कटवाकर फिर से CRPF की वर्दी पहनी, तो उनकी जिंदगी का एक लंबा अध्याय पूरा हुआ।
54 साल की उम्र में वापस मिली यह नौकरी उन 27 वर्षों को वापस नहीं ला सकती, जो उन्होंने इंतजार और कानूनी लड़ाई में बिताए। लेकिन इसने उन्हें वह मौका जरूर दिया, जिसके लिए उन्होंने लगभग आधी जिंदगी संघर्ष किया था।
गिरवर सिंह तोमर की कहानी धैर्य, आस्था और लगातार प्रयास की मिसाल है। करीब 27 साल के इंतजार के बाद आखिरकार वह दिन आया, जब उन्होंने एक बार फिर गर्व के साथ CRPF की खाकी वर्दी पहनी।
