15 अगस्त के मौके पर, भारत की आज़ादी की लड़ाई से जुड़ी 10 ऐसी कहानियाँ जानें जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं, इनमें पाइका विद्रोह, रानी गाइदिनल्यू, उषा मेहता का अंडरग्राउंड रेडियो और 1946 का नौसेना विद्रोह भी
नई दिल्ली: भारत की आज़ादी का इतिहास बहुत बड़ा और विविध है। आज़ादी की लड़ाई के बारे में बातचीत अक्सर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे बड़े नेताओं के इर्द-गिर्द ही घूमती है, लेकिन, इस लड़ाई में हज़ारों ऐसे लोग, आंदोलन और घटनाएँ भी शामिल थीं, जिनका ज़िक्र बहुत कम होता है।
कुछ जगहों पर किसानों और स्थानीय सैनिकों ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी, तो कहीं एक युवा छात्रा ने अंडरग्राउंड रेडियो स्टेशन के ज़रिए देश को ख़बरें सुनाईं। पूर्वोत्तर की एक किशोर लड़की ने ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ी, और महिलाओं ने आज़ाद हिंद फ़ौज के लिए हथियारों का प्रशिक्षण लिया।
आज़ादी के दिन के मौके पर, आइए आज़ादी की लड़ाई से जुड़े ऐसे 10 तथ्यों के बारे में जानें जो हमें इतिहास को एक अलग नज़रिए से देखने में मदद करते हैं।
1. 1857 से 40 साल पहले ओडिशा में उठी थी बड़ी बगावत
जब 1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास में ब्रिटिश शासन के खिलाफ बड़े सैन्य विद्रोह के रूप में जाना जाता है, उससे करीब चार दशक पहले ओडिशा में पाइका विद्रोह हो चुका था। 1817 में खुर्दा क्षेत्र के पाइकों ने बख्शी जगबंधु के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ हथियार उठाए।
पाइका स्थानीय पारंपरिक सैन्य व्यवस्था से जुड़े लोग थे। ब्रिटिश शासन के दौरान उनकी जमीन और पुराने अधिकारों पर असर पड़ा। राजस्व व्यवस्था, भूमि संबंधी नीतियों, नमक पर नियंत्रण और मुद्रा संबंधी बदलावों ने भी लोगों में असंतोष बढ़ाया।
मार्च-अप्रैल 1817 में विद्रोह तेज हुआ और खुर्दा, बनापुर तथा आसपास के इलाकों तक फैल गया। ब्रिटिश प्रशासन को इसे दबाने के लिए सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी। बख्शी जगबंधु लंबे समय तक भूमिगत रहकर संघर्ष करते रहे और 1825 में आत्मसमर्पण किया।
खास बात: पाइका विद्रोह को ओडिशा के इतिहास में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ शुरुआती बड़े जन प्रतिरोधों में गिना जाता है।

2. रानी गाइदिन्ल्यू ने किशोरावस्था में ही अंग्रेजों को दी चुनौती
पूर्वोत्तर भारत की स्वतंत्रता संग्राम की कहानी में रानी गाइदिन्ल्यू का नाम खास महत्व रखता है। वह बेहद कम उम्र में ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन से जुड़ गई थीं।
उन्होंने लगभग 13 वर्ष की उम्र में हेराका आंदोलन में भाग लेना शुरू किया। उनके चचेरे भाई और आंदोलन के नेता हैपौ जदोनांग को 1931 में फांसी दिए जाने के बाद गाइदिन्ल्यू ने प्रतिरोध की कमान संभाली।
उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ कर न देने की अपील की और गुरिल्ला तरीके से प्रतिरोध किया। 1932 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय उनकी उम्र लगभग 16 वर्ष थी। उन्होंने करीब 14 साल जेल में बिताए।
1937 में जवाहरलाल नेहरू ने जेल में उनसे मुलाकात की और उन्हें ‘रानी’ कहकर संबोधित किया। स्वतंत्रता के बाद उन्हें जेल से रिहा किया गया।
खास बात: गाइदिन्ल्यू की कहानी दिखाती है कि स्वतंत्रता आंदोलन में पूर्वोत्तर के आदिवासी और स्थानीय समुदायों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

3. 22 साल की उषा मेहता ने चलाया था भूमिगत रेडियो
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन ब्रिटिश सरकार के लिए बड़ी चुनौती था। आंदोलन के दौरान कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। ऐसे समय में सूचनाओं का स्वतंत्र रूप से प्रसार करना बेहद मुश्किल था।
इसी दौर में उषा मेहता, जो उस समय सिर्फ 22 साल की थीं, ने अपने साथियों के साथ मिलकर भूमिगत Congress Radio शुरू किया।
इस रेडियो से ब्रिटिश सेंसरशिप से बाहर की खबरें और आंदोलन से जुड़े संदेश प्रसारित किए जाते थे। इसका प्रसिद्ध उद्घोष था— “This is the Congress Radio calling…”। रेडियो कुछ समय तक अलग-अलग गुप्त स्थानों से चलाया गया, लेकिन नवंबर 1942 में ब्रिटिश पुलिस ने इसके संचालन से जुड़े लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
खास बात: एक युवा छात्रा ने उस दौर में रेडियो जैसे तकनीकी माध्यम को ब्रिटिश सेंसरशिप के खिलाफ हथियार बना दिया था।

4. अंग्रेजों के समानांतर कुछ जगहों पर अपनी सरकारें चलने लगी
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान केवल प्रदर्शन और गिरफ्तारियां ही नहीं हुईं। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय लोगों ने ब्रिटिश प्रशासन को हटाकर समानांतर सरकारें स्थापित करने की कोशिश की।
बंगाल के तमलुक, महाराष्ट्र के सतारा और उत्तर प्रदेश के बलिया जैसे क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन के वैकल्पिक ढांचे सामने आए।
इनमें से सतारा की प्रति सरकार सबसे लंबे समय तक सक्रिय रहने वाली व्यवस्थाओं में मानी जाती है। नाना पाटिल जैसे नेताओं के नेतृत्व में स्थानीय स्तर पर प्रशासन, न्याय और जनसेवा से जुड़े काम किए गए।
खास बात: इससे पता चलता है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने की मांग तक सीमित नहीं था, बल्कि कई जगहों पर लोग वैकल्पिक स्थानीय शासन की कल्पना और प्रयोग भी कर रहे थे।
5. पेशावर में भारतीय सैनिकों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से किया इनकार
1930 में पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रदर्शन हुआ। बड़ी संख्या में लोग सविनय अवज्ञा आंदोलन और खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व वाले खुदाई खिदमतगार आंदोलन से जुड़े थे।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश प्रशासन ने सैनिकों को प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया। लेकिन 2/18 रॉयल गढ़वाल राइफल्स के भारतीय सैनिकों ने गोली चलाने से इनकार कर दिया। चंद्र सिंह गढ़वाली इस घटना से जुड़े प्रमुख नामों में थे।
इस अवज्ञा के गंभीर परिणाम हुए और सैनिकों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की गई।
खास बात: यह घटना दिखाती है कि स्वतंत्रता आंदोलन का असर ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय जवानों के बीच भी दिखाई देने लगा था।
6. नमक आंदोलन सिर्फ दांडी मार्च तक सीमित नहीं
जब भी 1930 के नमक सत्याग्रह की बात होती है, सबसे पहले महात्मा गांधी का दांडी मार्च याद आता है। लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में भी नमक कानून के खिलाफ आंदोलन हुए।
दक्षिण भारत में सी. राजगोपालाचारी ने तमिलनाडु के त्रिचिनोपोली से वेदारण्यम तक नमक मार्च का नेतृत्व किया। वहां भी लोगों ने ब्रिटिश नमक कानून को चुनौती दी।
इस तरह नमक सत्याग्रह अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय नेतृत्व और भागीदारी के साथ आगे बढ़ा।
खास बात: दांडी मार्च प्रतीकात्मक रूप से सबसे प्रसिद्ध था, लेकिन नमक कानून के खिलाफ विरोध एक व्यापक राष्ट्रीय अभियान बन गया था।

7. महिलाओं की अपनी रेजिमेंट थी आजाद हिंद फौज में
सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (INA) का एक महत्वपूर्ण और कम चर्चित पहलू उसकी महिला रेजिमेंट थी।
रानी झांसी रेजिमेंट का नाम वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर रखा गया था। इसमें महिलाओं को सैन्य प्रशिक्षण दिया गया। इसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल से जुड़ा हुआ है।
उस दौर में महिलाओं का इस तरह संगठित सैन्य भूमिका में आना असाधारण बात थी। इस रेजिमेंट ने यह संदेश दिया कि देश की आजादी की लड़ाई में महिलाएं भी केवल सहायक भूमिका तक सीमित नहीं थीं।
खास बात: INA की महिला रेजिमेंट ने स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ महिलाओं की सामाजिक और सैन्य भूमिका की पारंपरिक सीमाओं को भी चुनौती दी।

8. क्रांतिकारियों ने लिया गुप्त संदेश और भूमिगत प्रेस का सहारा
ब्रिटिश सरकार स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारी संगठनों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखती थी। ऐसे में संदेशों को सुरक्षित तरीके से पहुंचाना अपने आप में चुनौती था।
कई क्रांतिकारी समूहों ने गुप्त नेटवर्क, कोड शब्दों, छिपे हुए संदेशों और भूमिगत छापाखानों का इस्तेमाल किया। प्रतिबंधित पर्चे, साहित्य और राजनीतिक संदेश गुप्त तरीके से लोगों तक पहुंचाए जाते थे।
इन तरीकों ने ब्रिटिश सेंसरशिप और निगरानी के बावजूद आंदोलन की सूचनाओं को अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुंचाने में मदद की।
खास बात: स्वतंत्रता आंदोलन केवल सड़कों पर होने वाले आंदोलनों तक सीमित नहीं था; सूचना और संचार भी संघर्ष का अहम हिस्सा था।
9. 1946 का नौसैनिक विद्रोह
फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी (RIN) विद्रोह शुरू हुआ। इसकी शुरुआत बंबई में HMIS Talwar के भारतीय नौसैनिकों के विरोध से हुई और जल्द ही इसका असर दूसरे जहाजों और बंदरगाहों तक पहुंचा।
नौसैनिकों की शिकायतों में खराब भोजन, नस्लीय भेदभाव, वेतन और सेवा की परिस्थितियों से जुड़े मुद्दे शामिल थे। लेकिन आंदोलन तेजी से व्यापक असंतोष और औपनिवेशिक शासन के विरोध से जुड़ गया।
बंबई में मजदूरों और आम लोगों के एक हिस्से ने भी प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया। हालांकि विद्रोह लंबे समय तक नहीं चला, लेकिन 1946 में ब्रिटिश सत्ता के लिए यह एक गंभीर संकेत था कि असंतोष केवल राजनीतिक संगठनों तक सीमित नहीं रह गया था।
खास बात: आजादी से सिर्फ एक साल पहले हुआ यह विद्रोह ब्रिटिश शासन की कमजोर होती पकड़ की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।

10. 15 अगस्त 1947 को गांधी दिल्ली में नहीं
15 अगस्त 1947 भारत के लिए ऐतिहासिक दिन था। दिल्ली में सत्ता हस्तांतरण और स्वतंत्रता समारोह हो रहे थे। जवाहरलाल नेहरू ने आधी रात को अपना प्रसिद्ध ‘Tryst with Destiny’ भाषण दिया।
लेकिन महात्मा गांधी इस पूरे उत्सव का हिस्सा बनने के लिए दिल्ली में मौजूद नहीं थे। वह कलकत्ता में थे, जहां विभाजन के बाद सांप्रदायिक तनाव और हिंसा को शांत करने की कोशिश कर रहे थे।
गांधी के लिए उस समय स्वतंत्रता का जश्न मनाने से ज्यादा जरूरी लोगों के बीच शांति स्थापित करना था। गांधी हेरिटेज पोर्टल के रिकॉर्ड में भी 15 अगस्त 1947 को कलकत्ता में उनके उपवास का उल्लेख मिलता है, जिसका उद्देश्य विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ शांति का संदेश देना था।
खास बात: जिस दिन देश आजादी का जश्न मना रहा था, उस दिन गांधी का ध्यान उन लोगों पर था जो विभाजन की हिंसा से पीड़ित थे।

आज़ादी की कहानी सिर्फ़ बड़े नेताओं की कहानी नहीं
भारत की आज़ादी की लड़ाई कई अलग-अलग धाराओं से मिलकर बनी थी। इसमें न सिर्फ़ बड़े राजनीतिक नेता, बल्कि किसान, आदिवासी, महिलाएँ, छात्र, सैनिक, मज़दूर, स्थानीय नेता और आम नागरिक भी शामिल थे।
ओडिशा में पाइका विद्रोह, पूर्वोत्तर में रानी गाइदिनल्यू का संघर्ष, उषा मेहता का अंडरग्राउंड रेडियो, पेशावर में सैनिकों का विद्रोह और 1946 का नौसेना विद्रोह – ये सभी इस बड़ी तस्वीर के अलग-अलग हिस्से हैं।
इन घटनाओं को याद रखना ज़रूरी है क्योंकि आज़ादी किसी एक आंदोलन, संगठन या व्यक्ति की उपलब्धि नहीं थी; यह लंबे समय तक चले कई स्थानीय और राष्ट्रीय संघर्षों का नतीजा थी। आज़ादी के दिन इन कम जानी-पहचानी कहानियों के बारे में जानना, उस इतिहास को बेहतर ढंग से समझने का एक ज़रिया है।
