कौन हैं ड्रैग-फ्लिक के बादशाह संदीप सिंह ?

कौन हैं ड्रैग-फ्लिक के बादशाह संदीप सिंह ?

संदीप सिंह सैनी, भारतीय हॉकी के लीजेंड और दुनिया के सबसे बेहतरीन ड्रैग-फ्लिकर। 2006 में गोली लगने के बावजूद कमबैक करके भारत को गौरव दिलाया

नई दिल्ली: संदीप सिंह सैनी, जिन्हें “फ्लिकर सिंह” के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय फील्ड हॉकी के सबसे प्रसिद्ध खिलाड़ियों में से एक हैं। वे एक बेहतरीन फुल-बैक और पेनल्टी कॉर्नर स्पेशलिस्ट रहे हैं। अपनी तेज़ और सटीक ड्रैग-फ्लिक से उन्होंने दुनिया भर में धूम मचाई।

संदीप, जिनका जन्म 27 फरवरी, 1986 को हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले के शाहबाद में हुआ था, का सफ़र संघर्ष, कड़ी मेहनत और मज़बूत इच्छाशक्ति का एक बेहतरीन उदाहरण है। 17 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेब्यू करके वे भारतीय हॉकी टीम के सबसे कम उम्र के ओलंपियन बन गए। उनकी कहानी सिर्फ़ खेल के बारे में ही नहीं है; बल्कि यह ज़िंदगी में जीत हासिल करने के बारे में है।

बचपन मे हॉकी की शुरुआत

संदीप का परिवार एक साधारण परिवार था। उनका कहना है कि उन्होंने हॉकी खेलना एक निजी घटना से उपजे गुस्से और प्रेरणा के कारण शुरू किया। उन्होंने 2004 के एथेंस ओलंपिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जब वे केवल 17 वर्ष के थे। यह रिकॉर्ड आज भी कायम है। उन्होंने बहुत जल्द अपनी पहचान बनाई और अपने ‘ड्रैग-फ्लिक’ के लिए मशहूर हो गए।

क्यों कहते हैं ‘फ्लिकर सिंह’?

संदीप फुल-बैक पोज़िशन पर खेलते थे और पेनल्टी कॉर्नर के समय उनका ड्रैग-फ्लिक बिल्कुल तोप की गोली जैसा होता था। उनके नाम एक विश्व रिकॉर्ड भी दर्ज है, सबसे तेज़ ड्रैग-फ्लिक जो 145 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से मारी गई थी (लगभग 2010–2012 के बीच)।

उनकी इसी खासियत को देखकर उन्हें “फ्लिकर सिंह” का खिताब मिला था। जब भी कोई पेनल्टी कॉर्नर होता, तो पूरा स्टेडियम साँस थामकर बैठ जाता था, क्योंकि संदीप की ‘फ्लिक’ देखते ही देखते गोलपोस्ट में समा जाती थी।

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शानदार वापसी और करियर की उपलब्धियाँ

संदीप लगभग दो साल की कठिन रिकवरी के बाद अंतरराष्ट्रीय हॉकी में वापस आ गए, जो पहले की तुलना में एक बेहतर खिलाड़ी साबित हुए। यह सिर्फ वापसी नहीं थी एक चमत्कार था।

  • ओलंपिक (2004 एथेंस और 2012 लंदन): दो बार भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2004 में सबसे कम उम्र के भारतीय ओलंपियन बने।
  • सुल्तान अज़लान शाह कप 2009: भारत की कप्तानी करते हुए 13 साल बाद यह प्रतिष्ठित कप जिताया। टूर्नामेंट के टॉप स्कोरर रहे और ‘मैन ऑफ द टूर्नामेंट’ पुरस्कार जीता।
  • राष्ट्रमंडल खेल 2010 (नई दिल्ली): भारत को रजत पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
  • एशियाई खेल 2010 (गुआंगझू): टीम के साथ पदक जीता।
  • हॉकी इंडिया लीग 2013: 12 मैचों में 11 गोल करके टॉप स्कोरर बने।
  • 200+ अंतरराष्ट्रीय मैच और 150+ गोल: भारतीय हॉकी में उनके योगदान का आँकड़ा खुद बोलता है।

वे 2008 और 2009 सुल्तान अजलान शाह कप में भी टॉप स्कोरर रहे थे।

कमबैक की कहानी

26 अगस्त, 2006 को संदीप दिल्ली-कालका शताब्दी एक्सप्रेस से यात्रा कर रहे थे; वे जर्मनी में होने वाले FIH विश्व कप के लिए राष्ट्रीय टीम में शामिल होने जा रहे थे। उसी रात, रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के एक कांस्टेबल की बंदूक से गलती से एक गोली चल गई, जो संदीप के कूल्हे में जा लगी। एक ही पल में, उनका करियर, उनके सपने और उनकी ज़िंदगी सब कुछ दांव पर लग गया।

डॉक्टरों ने बताया कि गोली रीढ़ की हड्डी के पास लगी है और शायद वे दोबारा चल भी न पाएँ। महीनों व्हीलचेयर पर बिताए, लेकिन संदीप ने हार नहीं मानी। हर दिन जद्दोजहद की, हर दर्द को ताकत में बदला।

लेकिन उनकी हिम्मत ने सब कुछ बदल दिया। कड़ी मेहनत और रिहैबिलिटेशन के बाद वे वापस मैदान पर फिर लौटे, और 2008 में फिर टीम में जगह बनाई और 2009 में कप्तान बनकर देश की सेवा की।

उनकी इस कहानी पर 2018 में फिल्म “सूरमा” बनी, जिसमें दिलजीत दोसांझ ने उनकी भूमिका निभाई।

पुरस्कार और सम्मान

  • अर्जुन पुरस्कार (2010): भारत सरकार द्वारा खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कारों में से एक।
  • हरियाणा पुलिस में DSP: उनकी उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस का पद मिला।
  • मानद डॉक्टरेट: उनकी जीवन यात्रा और खेल में योगदान के लिए विश्वविद्यालय की ओर से सम्मानित किया गया।
  • राजनीति में कदम: 2019 में हरियाणा विधानसभा चुनाव में पेहोवा सीट से जीत कर हरियाणा के खेल मंत्री बने।

संदीप सिंह सिर्फ एक हॉकी खिलाड़ी नहीं, बल्कि हौसले का दूसरा नाम हैं। उनकी कहानी यह सिखाती है कि जब इरादा पक्का हो, तो न गोली रोक सकती है, न व्हीलचेयर और न ही कोई मुसीबत।

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