‘नशीली दवाओं के खिलाफ युद्ध’ के बीच किंगडम ने तोड़ा अपना ही रिकॉर्ड
सऊदी अरब ने एक ही वर्ष में दी जाने वाली फाँसी की सज़ाओं के अपने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। एजेंसी फ्रांस-प्रेस (AFP) की ताजा गिनती के अनुसार, 15 दिसंबर 2025 को मक्का क्षेत्र में तीन और लोगों को मृत्युदंड दिए जाने के बाद, इस साल फाँसी पाने वालों की कुल संख्या 340 तक पहुँच गई है। यह आंकड़ा मानवाधिकार समूहों द्वारा 1990 के दशक से रखे जा रहे रिकॉर्ड में अब तक का सबसे बड़ा परेशानी और आशंका का स्तर है।
फाँसी की संख्या में भारी उछाल: एक चिंताजनक है
सऊदी अरब पिछले कुछ वर्षों से मृत्युदंड के मामले में दुनिया के सबसे ऊपर देशों (चीन और ईरान के बाद) में बना हुआ है। साल 2024 में यहाँ 338 लोगों को फाँसी दी गई थी, लेकिन 2025 के खत्म होने से पहले ही यह संख्या 340 हो गई है।
इस उछाल का सबसे बड़ा कारण ड्रग्स,नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में मृत्युदंड का दोबारा शुरू होना है। साल 2025 में हुई 340 फाँसी में से 232 सज़ाएँ केवल नशीले पदार्थों की तस्करी और उससे ताल्लुक़ रखने वाले अपराधों के लिए दी गई हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सऊदी अरब ने 2021 से लगभग तीन साल तक ड्रग्स के मामलों में फाँसी पर रोक लगा रखी थी, जिसे 2022 के अंत में अचानक हटा लिया गया।
सऊदी अरब का ‘ड्रग्स पर युद्ध’
सऊदी अरब वर्तमान में अरब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन साथ ही यह ‘कैप्टागॉन’ (Captagon) जैसी अवैध दवाओं के लिए एक बहुत बड़ा बाज़ार भी बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, कैप्टागॉन एक ऐसा नशीला पदार्थ है जो खाड़ी देशों में बड़े पैमाने पर तस्करी किया जाता है।
सऊदी सरकार ने 2023 से नशीली दवाओं के खिलाफ एक व्यापक अभियान छेड़ रखा है। इसके तहत सीमाओं और राजमार्गों पर पुलिस चौकियों की संख्या बढ़ाई गई है। करोड़ों की संख्या में नशीली गोलियां जब्त की गई हैं। सैकड़ों तस्करों को गिरफ्तार किया गया है, जिनकी कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब उन्हें बड़े पैमाने पर फाँसी दी जा रही है।
विदेशी नागरिकों पर गहरा प्रभाव
मानवाधिकार संगठन ‘रिप्राइव’ (Reprieve) और ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ के अनुसार, फाँसी पाने वालों में एक बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की है। ये लोग अक्सर गरीब देशों से आते हैं और उनके पास उचित कानूनी सहायता या अनुवादकों की सुविधा नहीं होती। अंतरराष्ट्रीय कानून कहता है कि मृत्युदंड केवल ‘सबसे गंभीर अपराधों’ (जैसे हत्या) के लिए होना चाहिए, लेकिन सऊदी अरब इसे गैर-हिंसक नशीले पदार्थों के मामलों में भी लागू कर रहा है, जो वैश्विक स्तर पर निंदा का विषय है।
छवि सुधार की कोशिश और मानवाधिकारों का विरोधाभास
क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के ‘विजन 2030’ के तहत सऊदी अरब अपनी छवि को एक आधुनिक और उदार समाज के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। देश पर्यटन, खेलों (जैसे 2034 फीफा विश्व कप) और ‘नियोम’ (NEOM) जैसे मेगा-प्रोजेक्ट्स पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है। हालांकि, कार्यकर्ताओं का कहना है कि फाँसी की ये बढ़ती संख्या इस “आधुनिक छवि” के बिल्कुल विपरीत है। मानवाधिकार समूहों का तर्क है कि इस तरह की कठोरता किंगडम के सुधारवादी दावों को कमजोर करती है।
सरकार का पक्ष: सुरक्षा और न्याय
सऊदी अधिकारियों का रुख इस मामले में स्पष्ट है। उनका कहना है कि नशीली दवाएं समाज और युवाओं के लिए खतरा हैं, इसलिए सख्त सज़ा अनिवार्य है। अधिकारियों के अनुसार, फाँसी तभी दी जाती है जब आरोपी अपील के सभी कानूनी रास्ते (सुप्रीम कोर्ट तक) खत्म कर चुका हो। सऊदी अरब अपनी इस्लामी शरीयत आधारित कानूनी प्रणाली को अपनी स्वतंत्र सत्ता का हिस्सा मानता है।
2025 की यह रिपोर्ट न केवल सऊदी अरब की आंतरिक न्याय व्यवस्था को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे आर्थिक विकास और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाना किंगडम के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। वैश्विक समुदाय की नज़र अब इस बात पर है कि क्या सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकेगा या अपनी इस कठोर नीति को जारी रखेगा।
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