क्रिकेट से शूटिंग तक, इंजीनियरिंग से पिस्टल तक, जानिए उन भारतीय खिलाड़ियों की कहानी जिन्होंने 20s या 30s की उम्र में खेल की शुरुआत करके ओलंपिक और राष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन किया
नई दिल्ली: खेल की दुनिया में अक्सर यह माना जाता है कि महानता हासिल करने के लिए बचपन से ही ट्रेनिंग शुरू करनी पड़ती है; एकेडमी, कोचिंग और प्रतियोगिताओं से जल्दी जुड़ना सफलता की कुंजी माना जाता है। हालाँकि, कुछ भारतीय एथलीटों ने इस सोच को पूरी तरह से बदल दिया है।
इन एथलीटों ने अपने खेल का सफ़र तब शुरू किया—या अपने खेल को गंभीरता से लेने का फ़ैसला तब किया—जब ज़्यादातर खिलाड़ी अपने करियर के शिखर पर पहुँचने की तैयारी कर रहे होते हैं। कुछ ने नौकरी करते हुए ट्रेनिंग की, तो कुछ ने अपने सपनों को पूरा करने के लिए पढ़ाई छोड़ दी, और कुछ ने आर्थिक तंगी के बावजूद हार नहीं मानी।
आज, इन्हीं एथलीटों ने ओलंपिक, वर्ल्ड चैंपियनशिप, कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स जैसे बड़े मंचों पर भारत का नाम रोशन किया है। आइए, इन भारतीय एथलीटों की कहानियाँ जानते हैं जिन्होंने साबित कर दिया कि मज़बूत इरादों के साथ, उम्र कभी भी सफलता की राह में रुकावट नहीं बनती।
मैराज अहमद खान: क्रिकेट छोड़ 28 साल की उम्र में उठाई बंदूक, पहुंचे ओलंपिक तक
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से आने वाले मैराज अहमद खान बचपन में क्रिकेटर बनना चाहते थे। उन्होंने आयु वर्ग की क्रिकेट प्रतियोगिताएं भी खेलीं और एक विश्वविद्यालय मैच में भारत के पूर्व विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग के साथ मैदान साझा किया।
हालांकि वर्ष 2003 में, लगभग 28 वर्ष की उम्र में उन्होंने शूटिंग को गंभीरता से अपनाया। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन लगातार मेहनत ने उन्हें राष्ट्रीय टीम तक पहुंचा दिया।
उन्होंने 2006 एशियाई खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 2016 में आईएसएसएफ वर्ल्ड कप (रियो) में स्कीट स्पर्धा में रजत पदक जीतकर अपने करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल की। इसी प्रदर्शन के दम पर उन्होंने रियो ओलंपिक 2016 के लिए भी क्वालिफाई किया। उनकी कहानी बताती है कि करियर बदलने में कभी देर नहीं होती।

अभिषेक वर्मा: इंजीनियरिंग और कानून की पढ़ाई के बाद बने विश्व स्तरीय निशानेबाज
हरियाणा के अभिषेक वर्मा ने खेल से पहले पढ़ाई को प्राथमिकता दी। उन्होंने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की और इसके बाद कानून की पढ़ाई भी शुरू की।
इसी दौरान उन्होंने पिस्टल शूटिंग में हाथ आजमाया और देखते ही देखते राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गए। करीब 29 वर्ष की उम्र में उन्होंने 2018 एशियाई खेलों में अंतरराष्ट्रीय पदार्पण किया और पहली ही प्रतियोगिता में 10 मीटर एयर पिस्टल टीम स्पर्धा में कांस्य पदक जीता।
इसके बाद 2019 आईएसएसएफ वर्ल्ड कप में उन्होंने दो स्वर्ण पदक जीते और विश्व रैंकिंग में शीर्ष स्थान तक पहुंचे। उन्होंने टोक्यो ओलंपिक 2020 (2021 में आयोजित) में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनकी सफलता यह साबित करती है कि पढ़ाई और खेल दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

स्वप्निल कुसाले: रेलवे की नौकरी करते हुए जीता भारत का ऐतिहासिक ओलंपिक पदक
महाराष्ट्र के कोल्हापुर के रहने वाले स्वप्निल कुसाले किसान परिवार से आते हैं। उन्होंने करीब 14 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र सरकार के खेल कार्यक्रम के जरिए शूटिंग शुरू की।
आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी। बेहतर प्रशिक्षण और महंगे उपकरणों के लिए परिवार ने जमीन तक बेच दी। इस दौरान स्वप्निल भारतीय रेलवे में टिकट कलेक्टर (टीटीई) की नौकरी भी करते रहे।
लंबे संघर्ष के बाद पेरिस ओलंपिक 2024 में उन्होंने 50 मीटर राइफल थ्री पोजिशन स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। इस स्पर्धा में ओलंपिक पदक जीतने वाले वह पहले भारतीय बने। यह पदक सिर्फ उनकी मेहनत का नहीं, बल्कि पूरे परिवार के त्याग का सम्मान था।

सीमा बिसला: 29 साल की उम्र में ओलंपिक का टिकट हासिल करने वाली पहलवान
हरियाणा के रोहतक की सीमा बिसला ने ऐसे समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई, जब कई खिलाड़ी अपने करियर के अंतिम दौर में होते हैं।
उन्होंने 2021 एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर पहली बड़ी अंतरराष्ट्रीय सफलता हासिल की। इसके बाद उन्होंने टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया।
महिला कुश्ती जैसे बेहद कठिन और शारीरिक खेल में 29 वर्ष की उम्र में इस मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था। सीमा ने अपनी मेहनत और फिटनेस से यह कर दिखाया।

एंथनी अमलराज: 26 साल की उम्र में बने राष्ट्रीय चैंपियन
तमिलनाडु के टेबल टेनिस खिलाड़ी एंथनी अमलराज को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान अपेक्षाकृत देर से मिली। उन्होंने 2012 में 26 वर्ष की उम्र में पहली बार राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीती। इसके बाद उन्होंने अनुभवी खिलाड़ी अचंता शरत कमल के साथ जोड़ी बनाकर कई अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां हासिल कीं।
उनकी प्रमुख उपलब्धियां:
- कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत और स्वर्ण पदक
- एशियाई खेलों में कांस्य पदक
- वर्ष 2017 में अर्जुन पुरस्कार
उनकी कहानी बताती है कि निरंतर प्रदर्शन ही सबसे बड़ी पहचान बनता है।

अविनाश साबले: सेना की नौकरी से ओलंपिक ट्रैक तक का सफर
महाराष्ट्र के बीड जिले के रहने वाले अविनाश साबले भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। सेना में रहते हुए उन्होंने कठिन इलाकों, यहां तक कि सियाचिन ग्लेशियर जैसे क्षेत्रों में भी सेवा दी। करीब 21 वर्ष की उम्र में सेना की क्रॉस कंट्री प्रतियोगिता के दौरान उनकी प्रतिभा सामने आई और उन्होंने स्टीपलचेज़ में करियर बनाने का फैसला किया।
इसके बाद उन्होंने लगातार राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़े।
उनकी उपलब्धियों में शामिल हैं:
- कई बार राष्ट्रीय रिकॉर्ड
- कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में रजत पदक
- एशियन गेम्स 2022 में स्वर्ण पदक
- टोक्यो और पेरिस ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व
सेना से मिली अनुशासन और फिटनेस ने उनके करियर को नई दिशा दी।

यूजेनेसन लिंगदोह: इंजीनियरिंग छोड़कर चुना फुटबॉल, फिर बने भारतीय टीम का हिस्सा
मेघालय के फुटबॉलर यूजेनेसन लिंगदोह ने इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ दी क्योंकि उनका सपना पेशेवर फुटबॉलर बनना था।
करीब 28 वर्ष की उम्र में उन्होंने बेंगलुरु एफसी से जुड़कर शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने क्लब के लिए एएफसी चैंपियंस लीग में पहला गोल किया और बाद में भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में भी जगह बनाई। उनकी कहानी बताती है कि कभी-कभी अपने दिल की सुनना ही सबसे बड़ा फैसला साबित होता है।

देर से सफलता क्यों मिल रही है?
पिछले कुछ वर्षों में भारत में खेलों का माहौल तेजी से बदला है।
सरकार की टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS), खेलो इंडिया, बेहतर स्पोर्ट्स साइंस, विदेशी कोच, मानसिक प्रशिक्षण और आधुनिक सुविधाओं ने खिलाड़ियों को लंबे समय तक प्रतिस्पर्धी बने रहने में मदद की है।
इसके अलावा अब यह भी समझ बढ़ी है कि शूटिंग, लंबी दूरी की दौड़, कुश्ती और कुछ अन्य खेलों में अनुभव, मानसिक मजबूती और धैर्य उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितनी कम उम्र की शुरुआत।
क्या सीख मिलती है इन खिलाड़ियों से ?
इन सभी खिलाड़ियों की कहानियां अलग-अलग हैं, लेकिन इनका संदेश एक ही है—
- सफलता की कोई तय उम्र नहीं होती।
- अगर मेहनत लगातार जारी रहे, तो देर से मिली शुरुआत भी बड़ी उपलब्धि में बदल सकती है।
- आर्थिक परेशानियां, नौकरी या पढ़ाई सपनों की राह में रुकावट जरूर बन सकती हैं, लेकिन अंत नहीं।
- सही मार्गदर्शन, अनुशासन और धैर्य किसी भी खिलाड़ी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं।
ये भारतीय एथलीट उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा हैं जो यह सोचकर अपने सपने छोड़ देते हैं कि अब बहुत देर हो चुकी है। मैराज अहमद खान से लेकर स्वप्निल कुसाले और अविनाश साबले तक, हर कहानी यह दिखाती है कि अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कोई तय समय-सीमा नहीं होती।
