विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर एकजुटता
एक समय था जब गौरैया (House Sparrow) हर भारतीय घर-आँगन का एक अविभाज्य हिस्सा थी। उसकी चहचहाहट से ही सुबह होती थी। हालाँकि, पिछले दो दशकों में शहरी क्षेत्रों से इस नन्हीं चिड़िया का लगभग गायब हो जाना, विकास की हमारी दौड़ पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। विशेषज्ञ इसे न केवल भावनात्मक क्षति, बल्कि हमारे पर्यावरण के लिए एक बड़ा जैव-संकेतक (Bio-indicator) मानते हैं, जो हमें आगाह कर रहा है कि हमारा शहरी पारिस्थितिकी तंत्र अस्वस्थ हो चुका है।
प्रमुख कारण: क्यों गुम हो गई हमारी ‘नन्ही साथी’?
वैज्ञानिकों और प्रकृति प्रेमियों के अनुसार, गौरैया के तेजी से विलुप्त होने के पीछे मानव निर्मित कई कारक जिम्मेदार हैं:
1. आधुनिक वास्तुकला ने छीना घर (Loss of Habitat)
पुरानी इमारतों और घरों में लकड़ी के छज्जे, रोशनदान और दीवारों में छोटे-छोटे नुक्कड़ होते थे, जो गौरैया के लिए प्राकृतिक और सुरक्षित घोंसले का काम करते थे। आज की कंक्रीट और शीशे वाली आधुनिक वास्तुकला इन दरारों और छिद्रों से रहित है। इन इमारतों में पक्षियों को घोंसला बनाने या छिपने की जगह नहीं मिलती।
2. भोजन स्रोतों का विनाश (Food Chain Disruption)
- कीटनाशकों का प्रयोग: यह सबसे बड़ा कारण माना जाता है। खेतों और यहाँ तक कि शहरी बागानों में कीटनाशकों (Pesticides) के अत्यधिक उपयोग से गौरैया के बच्चों का मुख्य आहार—छोटे कीट (Insects) और लार्वा—पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं। भोजन न मिलने के कारण नवजात गौरैया जीवित नहीं रह पाती।
- खाद्य पदार्थों का पैकेजिंग: खुले में अनाज या रसोई का अपशिष्ट पहले गौरैया के लिए भोजन का स्रोत था। अब हर चीज पैक होने और स्वच्छता मानकों के कारण, उन्हें प्राकृतिक रूप से भोजन नहीं मिल पाता।
3. बढ़ता प्रदूषण और विकिरण (Radiation Impact)
अध्ययनों में पाया गया है कि मोबाइल टावरों से निकलने वाला विद्युतचुंबकीय विकिरण (Electromagnetic Radiation) गौरैया की प्रजनन क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करता है। यह विकिरण उनके अंडे सेने की प्रक्रिया में बाधा डालता है और उनके नेविगेशन (रास्ता खोजने) को भी बिगाड़ता है। साथ ही, शहरों का बढ़ता वायु प्रदूषण भी उनके श्वसन तंत्र को कमजोर करता है।
पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी
गौरैया का गायब होना केवल एक प्रजाति का लुप्त होना नहीं है। यह पर्यावरण के लिए एक खतरे की घंटी है।
- प्राकृतिक कीट नियंत्रण में बाधा: गौरैया एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक कीट नियंत्रक है। उसके न होने से हानिकारक कीटों की आबादी बढ़ जाती है, जिससे किसानों और बागवानों को और अधिक जहरीले रसायनों का सहारा लेना पड़ता है।
- अस्वस्थ वातावरण का संकेत: एक जीव विज्ञानी के अनुसार, जब गौरैया जैसे संवेदनशील पक्षी शहरी वातावरण में जीवित नहीं रह पाते, तो यह स्पष्ट संकेत है कि उस क्षेत्र की हवा, पानी और खाद्य श्रृंखला मनुष्यों के रहने के लिए भी अस्वस्थ होती जा रही है।
संरक्षण के उपाय: हम कैसे बचाएं अपनी धरोहर?
गौरैया और संकटग्रस्त अन्य पक्षियों को बचाने के लिए सामुदायिक और व्यक्तिगत स्तर पर तुरंत प्रयास आवश्यक हैं:
- कृत्रिम आवास की व्यवस्था: अपनी बालकनी और छत पर लकड़ी के छोटे घोंसले के बक्से (Nest Boxes) लगाएं। ये उन्हें सुरक्षित प्रजनन और रात्रि विश्राम स्थल प्रदान करते हैं।
- दाने और पानी की व्यवस्था: गर्मियों में मिट्टी के चौड़े बर्तन में पानी और थोड़ा सा दाना (बाजरा या चावल) नियमित रूप से रखें।
- देशी पौधे लगाएं: अपने घर के आस-पास झाड़ीदार और स्थानीय पौधे लगाएं जो कीटों को आकर्षित करें और पक्षियों को छिपने की जगह दें।
- रसायनों से दूरी: अपने घर या बगीचे में कीटनाशकों और रासायनिक स्प्रे के उपयोग से बचें, ताकि कीटों की आबादी बनी रहे जो पक्षियों का भोजन हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हमने अभी ध्यान नहीं दिया, तो वर्तमान पीढ़ी की लापरवाही के कारण भविष्य की पीढ़ियाँ न केवल गौरैया, बल्कि कई अन्य पक्षियों को भी केवल तस्वीरों में ही देख पाएंगी। यह हमारी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का सबसे बड़ा नुकसान होगा।
विश्व गौरैया दिवस और संरक्षण के प्रयास
हर साल 20 मार्च को ‘विश्व गौरैया दिवस’ मनाया जाता है।
इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य है लोगों को गौरैया और हमारे शहरों की जैव विविधता (Biodiversity) के संरक्षण के प्रति जागरूक करना।
आप इस दिन आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं, जैसे:
- जागरूकता अभियान
- पक्षी गणना (कितनी गौरैया हैं, इसकी गिनती)
- घोंसला वितरण (लोगों को मुफ्त में कृत्रिम घोंसले देना)
भारत में नेचर फॉरएवर सोसाइटी (Nature Forever Society – NFS) गौरैया संरक्षण के लिए एक प्रमुख संस्था है। यह संस्था:
- लोगों को ‘Nest Box’ (कृत्रिम घोंसले) वितरित करती है।
- घरों में गौरैया के लिए दाना और पानी रखने के लिए प्रोत्साहित करती है।
- स्थानीय स्तर पर संरक्षण की कार्यशालाएं आयोजित करती है।
यह भी पढ़े: लालू के घर का ‘महाभारत’: सबसे छोटी बेटी रोहिणी ने क्यों किया अपने ही परिवार को ‘ख़ारिज’?

