नई दिल्ली: जब भी भारतीय फिल्मों की बात होती है तो सबसे पहले “Bollywood” शब्द सुनाई देता है। दुनिया के लगभग हर देश में लोग बॉलीवुड को भारत की पहचान के रूप में जानते हैं। रंग-बिरंगे गाने, भव्य सेट, पारिवारिक कहानियां और भावनाओं से भरपूर फिल्में बॉलीवुड की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी हैं।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिस शब्द का आज पूरी दुनिया इस्तेमाल करती है, वह भारतीय सिनेमा की शुरुआत के साथ पैदा नहीं हुआ था। भारतीय फिल्मों का इतिहास “Bollywood” शब्द से कई दशक पुराना है। इस सफर की शुरुआत एक ऐसे व्यक्ति ने की, जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद भारत में फिल्म निर्माण का सपना देखने की हिम्मत दिखाई।
आज जब भारतीय सिनेमा दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में शामिल है, तब उसके शुरुआती दिनों की कहानी जानना और भी दिलचस्प हो जाता है।
बॉलीवुड शब्द आखिर आया कहां से?
“Bollywood” शब्द वास्तव में दो शब्दों का मेल है Bombay और Hollywood। उस समय मुंबई का नाम बॉम्बे था और यहीं से हिंदी फिल्मों का सबसे बड़ा निर्माण होता था। 1970 के दशक में फिल्म पत्रकारों और विदेशी मीडिया ने बॉम्बे और हॉलीवुड को मिलाकर “Bollywood” शब्द का इस्तेमाल शुरू किया। धीरे-धीरे यह इतना लोकप्रिय हो गया कि आज पूरी दुनिया हिंदी फिल्म उद्योग को इसी नाम से पहचानती है।
हालांकि कई फिल्मकारों का मानना है कि भारतीय सिनेमा की अपनी अलग पहचान है और उसे हॉलीवुड से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बावजूद “Bollywood” शब्द आम बोलचाल और मीडिया में सबसे ज्यादा प्रचलित हो गया।
भारतीय सिनेमा की शुरुआत कैसे हुई?
भारतीय सिनेमा की शुरुआत 3 मई 1913 को हुई, जब ‘राजा हरिश्चंद्र’ पहली पूर्ण लंबाई की भारतीय फीचर फिल्म के रूप में रिलीज हुई।
इस फिल्म का निर्माण और निर्देशन दादासाहेब फाल्के ने किया था। उन्हें भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है क्योंकि उन्होंने उस दौर में फिल्म निर्माण का साहसिक कदम उठाया, जब भारत में इस माध्यम के बारे में बहुत कम जानकारी थी।
फिल्म पौराणिक कथा पर आधारित थी और राजा हरिश्चंद्र के सत्य एवं त्याग की कहानी दिखाती थी। यह एक मूक फिल्म (Silent Film) थी, इसलिए इसमें संवाद नहीं थे। कहानी को अभिनय और दृश्य माध्यम से प्रस्तुत किया गया।
पहली फिल्म बनाना आसान नहीं था
आज फिल्में बनाना तकनीक के कारण आसान हो गया है, लेकिन 1913 में स्थिति बिल्कुल अलग थी। दादासाहेब फाल्के को कैमरा खरीदने से लेकर फिल्म प्रोसेस करने तक हर काम खुद सीखना पड़ा।
उन्होंने विदेश जाकर फिल्म निर्माण की तकनीक समझी और फिर भारत लौटकर अपना सपना पूरा किया। सबसे बड़ी चुनौती कलाकारों की थी। उस समय समाज में फिल्मों को सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था। खासकर महिलाएं फिल्मों में काम करने के लिए तैयार नहीं होती थीं।
पहली फिल्म में महिला कलाकार क्यों नहीं थीं?
आज फिल्मों में महिला कलाकारों की अहम भूमिका होती है, लेकिन भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म में ऐसा नहीं था। ‘राजा हरिश्चंद्र’ में रानी तारामती का किरदार भी एक पुरुष कलाकार अन्ना सालुंके ने निभाया था।
उस दौर में महिलाएं अभिनय करने से हिचकिचाती थीं, इसलिए पुरुष कलाकारों को ही महिला पात्र निभाने पड़ते थे। कुछ वर्षों बाद यह स्थिति बदली और धीरे-धीरे महिलाओं ने भी फिल्मों में काम करना शुरू किया।
भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री कौन थीं?
भारतीय फिल्मों में अभिनय करने वाली पहली महिला कलाकार के रूप में कमलाबाई गोखले का नाम लिया जाता है। उन्होंने उस समय फिल्मों में काम किया जब महिलाओं का अभिनय करना समाज में आसान नहीं माना जाता था। उनके इस कदम ने आने वाली पीढ़ियों की अभिनेत्रियों के लिए रास्ता खोला।
आज भारतीय फिल्म उद्योग में महिलाओं की भूमिका बेहद मजबूत है, लेकिन इसकी शुरुआत उन शुरुआती कलाकारों ने की जिन्होंने सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हुए अभिनय को अपनाया।
पहले अभिनेता कौन थे?
भारतीय सिनेमा की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ में राजा हरिश्चंद्र की भूमिका दत्तात्रेय दामोदर डाबके (D.D. Dabke) ने निभाई थी।
यही कारण है कि उन्हें भारतीय फिल्मों के शुरुआती प्रमुख अभिनेताओं में गिना जाता है। उनके अभिनय ने उस समय के दर्शकों को पहली बार बड़े पर्दे पर भारतीय पात्रों को जीवंत रूप में देखने का अनुभव दिया।
मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों तक का सफर
1913 से लेकर 1931 तक भारतीय फिल्मों का दौर मूक फिल्मों का था। इसके बाद 1931 में ‘आलम आरा’ रिलीज हुई, जिसे भारत की पहली बोलती फिल्म माना जाता है।
इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा की दिशा पूरी तरह बदल दी। पहली बार दर्शकों ने पर्दे पर कलाकारों की आवाज सुनी। इसी फिल्म में भारतीय सिनेमा का पहला फिल्मी गीत भी सुनाई दिया। इसके बाद संगीत भारतीय फिल्मों की सबसे बड़ी पहचान बन गया।
कैसे बदला भारतीय सिनेमा?
1940 और 1950 के दशक में भारतीय फिल्मों ने सामाजिक विषयों पर काम करना शुरू किया। राज कपूर, दिलीप कुमार, देव आनंद और नरगिस जैसे कलाकारों ने भारतीय फिल्मों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
1970 का दशक अमिताभ बच्चन के ‘एंग्री यंग मैन’ दौर के नाम रहा। इसके बाद 1990 के दशक में शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान जैसे सितारों ने रोमांटिक और पारिवारिक फिल्मों के जरिए बॉलीवुड को नई पहचान दी।
आज भारतीय फिल्म उद्योग केवल हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं है। दक्षिण भारतीय सिनेमा, मराठी, बंगाली, मलयालम, कन्नड़ और अन्य भाषाओं की फिल्में भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रही हैं।
बॉलीवुड सिर्फ मनोरंजन नहीं
भारतीय फिल्मों ने केवल दर्शकों का मनोरंजन नहीं किया, बल्कि समाज को दिशा भी दी। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर सामाजिक सुधार, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, परिवार, खेल और विज्ञान जैसे विषयों पर बनी फिल्मों ने लोगों की सोच को प्रभावित किया।
यही कारण है कि “Bollywood” केवल एक फिल्म उद्योग नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
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“Bollywood” शब्द भले ही 1970 के दशक में लोकप्रिय हुआ हो, लेकिन भारतीय सिनेमा की कहानी उससे कई दशक पहले शुरू हो चुकी थी। दादासाहेब फाल्के के सपने से शुरू हुआ यह सफर आज वैश्विक स्तर तक पहुंच चुका है।
‘राजा हरिश्चंद्र’ से लेकर आधुनिक पैन-इंडिया फिल्मों तक भारतीय सिनेमा लगातार बदलता रहा है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी ताकत हमेशा कहानी और भावनाएं रही हैं।
आज जब पूरी दुनिया भारतीय फिल्मों को सम्मान की नजर से देखती है, तब यह याद रखना जरूरी है कि इस विशाल उद्योग की नींव उन लोगों ने रखी थी, जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी असंभव को संभव बना दिया।
