रेणके आयोग के अध्यक्ष बालकृष्ण रेणके की चेतावनी—अनदेखी हुई तो होगा राष्ट्रव्यापी आंदोलन
नई दिल्ली, 16 मार्च:
देशभर के डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों (NT-DNT) के प्रतिनिधियों ने 14–15 मार्च 2026 को दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय बैठक के बाद “डीएनटी-एनटी फेडरेशन ऑफ इंडिया” के गठन की घोषणा की है। समुदाय के प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार से 2027 की जनगणना में NT-DNT समुदायों के लिए अलग कॉलम और विशिष्ट जातिगत कोड शामिल करने की मांग की और स्पष्ट किया कि यदि इन समुदायों की पहचान को फिर नजरअंदाज किया गया तो देशभर में व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलन खड़ा किया जाएगा।
नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित प्रेस वार्ता में बालकृष्ण सिदराम रेणके, दिगंबर राठोड, लालजी राईका, एस. पी. सिंह लबाना, गोपाल केशवत और डॉ. अभय जाधव और दीपा पवार उपस्थित रहे।
प्रतिनिधियों के अनुसार 14 और 15 मार्च को दिल्ली में आयोजित घुमंतू-विमुक्त परिषद में देश के 22 राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस बैठक में विभिन्न राज्यों में काम कर रहे भटके-विमुक्त संगठनों ने यह निर्णय लिया कि अब समय आ गया है कि इन समुदायों की आवाज को एक साझा राष्ट्रीय मंच से उठाया जाए।
इसी उद्देश्य से “डीएनटी-एनटी फेडरेशन ऑफ इंडिया” का गठन किया गया। फेडरेशन के राष्ट्रीय संयोजक के रूप में दिगंबर राठोड और लालजी राईका को जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह संगठन देशभर में फैले भटके-विमुक्त समुदायों और उनसे जुड़े हजारों संगठनों को जोड़ते हुए उनके अधिकारों, पहचान और सम्मानजनक जीवन के सवाल को राष्ट्रीय स्तर पर उठाएगा।
2027 की जनगणना में पहचान की मांग
प्रतिनिधियों ने कहा कि डिनोटिफाइड और घुमंतू समुदायों की सही गणना के बिना उनकी वास्तविक स्थिति सामने ही नहीं या सकती। कई समुदाय आज भी आधिकारिक आंकड़ों में ठीक से दर्ज नहीं हैं, जिसके कारण नीतियां बनाते समय उनकी समस्याएं नजरअंदाज हो जाती हैं।
इसीलिए प्रतिनिधियों की मांग है कि 2027 की जनगणना में NT-DNT समुदायों के लिए अलग कॉलम और विशिष्ट जातिगत कोड निर्धारित किया जाए, ताकि इन समुदायों की वास्तविक संख्या और स्थिति सामने आ सके।
इसके साथ ही समुदाय के नेताओं ने निम्नलिखित मांगें भी रखीं—
• सरकारी नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में 10 प्रतिशत आरक्षण
• भटके-विमुक्त परिवारों को भूमि अधिकार और स्थायी आवास
• समुदायों के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामलों में संवैधानिक और कानूनी संरक्षण
• NT-DNT समुदायों के विकास के लिए स्वतंत्र और पर्याप्त बजट प्रावधान
रेणके आयोग की सिफारिशें आज भी अधूरी
इस अवसर पर बालकृष्ण सिदराम रेणके ने उस आयोग की सिफारिशों को याद दिलाया, जिसकी अध्यक्षता उन्होंने की थी। केंद्र सरकार ने 2005 में डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों पर राष्ट्रीय आयोग गठित किया था, जिसकी रिपोर्ट 2008 में प्रस्तुत हुई थी।
रिपोर्ट में बताया गया था कि देश की 10 प्रतिशत से अधिक आबादी इन समुदायों से जुड़ी है और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति अत्यंत पिछड़ी है। आयोग ने इन समुदायों की जनगणना में स्वतंत्र गणना, पहचान पत्रों की उपलब्धता और शिक्षा तथा रोजगार के लिए विशेष योजनाएं लागू करने की सिफारिश की थी। लेकिन अभी तक इन सिफारिशों का आज तक पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हुआ। इसके कारण डिनोटिफाइड और घुमंतू समुदाय आज भी विकास की मुख्यधारा से बाहर हैं।
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प्रेस वार्ता में एस. पी. सिंह लबाना ने कहा कि जनगणना में पहचान न होने के कारण ये समुदाय आज भी नीति और विकास की प्रक्रियाओं से बाहर रह जाते हैं।
उन्होंने कहा, “हम कोई विशेष सुविधा नहीं मांग रहे। हमारी मांग केवल इतनी है कि हमें सही तरीके से गिना जाए। जब तक जनगणना में हमारी पहचान दर्ज नहीं होगी, तब तक हमारी समस्याएं नीति-निर्माण का हिस्सा नहीं बनेंगी।”
प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि डिनोटिफाइड और घुमंतू समुदायों के लाखों परिवार आज भी साफ पानी, स्थायी आवास और बुनियादी सुविधाओं के बिना जीवन जी रहे हैं। उनके खिलाफ होने वाले अत्याचारों का कोई स्वतंत्र और विश्वसनीय आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है, क्योंकि उनकी पहचान और गणना स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं होती।
समुदाय के नेताओं ने कहा कि इस देश के नागरिक होने के बावजूद डिनोटिफाइड और घुमंतू समुदायों को अक्सर उनके नागरिक अधिकारों, सम्मान और गरिमा से वंचित रखा गया। यह स्थिति सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।
मांगें नहीं मानी गईं तो होगा राष्ट्रव्यापी आंदोलन
समुदाय के प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार 2027 की जनगणना में NT-DNT समुदायों के लिए अलग कॉलम शामिल नहीं करती, तो देशभर में व्यापक आंदोलन खड़ा किया जाएगा।
प्रतिनिधियों ने कहा कि स्वतंत्रता से पहले और उसके बाद भी दशकों तक इन समुदायों ने उपेक्षा और भेदभाव का सामना किया है। अब समय आ गया है कि डिनोटिफाइड और घुमंतू समुदायों को संवैधानिक पहचान, समान अधिकार और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित किया जाए।
