भोपाल में 60 से ज्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज हुए बंद

भोपाल में 60 से ज्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज हुए बंद

कभी इंजीनियरिंग हब कहे जाने वाले भोपाल और इंदौर में अब बंद हो रहे कॉलेज, बदल रहे हैं रिसॉर्ट और नर्सिंग संस्थानों में

30 अप्रैल 2025, नई दिल्ली

मध्यप्रदेश में इंजीनियरिंग कॉलेजों का संकट गहराता जा रहा है। कभी इंजीनियरिंग शिक्षा का गढ़ माने जाने वाले इस राज्य में बीते नौ वर्षों में 155 से अधिक कॉलेज बंद हो चुके हैं। अकेले भोपाल में ही 60 से ज़्यादा संस्थानों ने अपने गेट हमेशा के लिए बंद कर दिए हैं। जिन इमारतों में कभी भविष्य गढ़ा जाता था, आज वहीं सन्नाटा पसरा है।

रतिबड़ स्थित गर्गी इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इसका बड़ा उदाहरण है। एक समय था जब यह संस्थान इनोवेशन और तकनीकी शिक्षा का प्रतीक माना जाता था, लेकिन आज हालात ये हैं कि बीटेक के मैकेनिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कोर्सों में छात्रों की कमी के चलते कॉलेज को गार्डन और रिसॉर्ट में बदलने की योजना बनाई जा रही है। अब यहां डिग्रियों की जगह हॉस्पिटैलिटी सर्विसेज की प्लानिंग हो रही है।

इसी तरह, आलिया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग को वित्तीय संकट ने जकड़ लिया और 2020 में यह कॉलेज बैंक द्वारा नीलाम कर दिया गया। आज यह संस्थान इंजीनियरिंग शिक्षा के स्थान पर एक नर्सिंग कॉलेज में तब्दील हो चुका है, जहां नर्सिंग और सुई-कढ़ाई जैसे व्यावसायिक कोर्स कराए जा रहे हैं। यह बदलाव न सिर्फ नाम का है, बल्कि पूरे उद्देश्य का भी।

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एक और मामला एक्रोपोलिस इंस्टिट्यूट का है, जो कभी अपने शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी संपर्कों के लिए चर्चित था। आज यह संस्थान पूरी तरह खाली पड़ा है। जहां कभी छात्राओं की आवाज़ गूंजती थी, अब वहां कबाड़ बेचने वाले बैठे नजर आते हैं। यहां पहले चलने वाला ब्यूटीशियन ट्रेनिंग प्रोग्राम भी अब बंद हो चुका है।

राज्य में इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या 300 से घटकर अब सिर्फ 140 रह गई है। सीटें भी घटकर 95,000 से 71,000 के करीब आ गई हैं। इसके पीछे कई गंभीर कारण हैं—सबसे बड़ा कारण है पुराना और अप्रासंगिक पाठ्यक्रम, जो छात्रों को रोजगार के योग्य नहीं बना पा रहा। साथ ही, कोर्सेज इंडस्ट्री की जरूरतों से मेल नहीं खाते, और व्यावहारिक स्किल्स की घोर कमी देखी जाती है। संसाधनों का अभाव, योग्य फैकल्टी की कमी और केवल कागजों पर रहने वाली इंटर्नशिप व रिसर्च ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है।

भोपाल और इंदौर जैसे शहर, जो कभी उत्तर भारत के छात्रों के लिए शिक्षा और कम लागत वाली जीवनशैली का बेहतर विकल्प हुआ करते थे, अब अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। सिर्फ इमारतें रहने से कॉलेज नहीं चलते, और बिना गुणवत्ता व प्लेसमेंट के, संस्थान सिर्फ ढांचा बनकर रह जाते हैं। मध्यप्रदेश में इंजीनियरिंग कॉलेजों की यह गिरावट स्पष्ट संकेत देती है कि अगर शिक्षा प्रणाली समय के अनुसार खुद को नहीं बदलेगी, तो डिग्रियों की जगह होटल और अस्पताल लेते देर नहीं लगेगी।

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