बांग्लादेश में हिंदू पत्रकार की दिनदहाड़े हत्या, ‘सुरक्षा कर’ देने के बावजूद नहीं बची जान

बांग्लादेश में हिंदू पत्रकार की दिनदहाड़े हत्या, ‘सुरक्षा कर’ देने के बावजूद नहीं बची जान

5 जनवरी 2026 को बांग्लादेश के जेसोर ज़िले में हिंदू कारोबारी और स्थानीय पत्रकार राणा प्रताप बैरागी की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई। जानिए पूरी घटना, कथित फिरौती और प्रशासन की प्रतिक्रिया।


बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल एक बार फिर उठाए गए हैं। 5 जनवरी, 2026 को, जे़शोर जिले में हिंदू समुदाय से जुड़े व्यवसायी और पार्ट-टाइम पत्रकार राणा प्रताप बैरागी को दिनदहाड़े ही हत्या कर दी गई। इस घटना को लेकर मीडिया, स्थानीय गांववासियों और बांग्लादेशी प्रशासन से अलग-अलग प्रतिक्रिया सामने आ रही हैं, जिससे यह मुद्दा और भी संवेदनशील बन गया है।

पीड़ित का परिचय

राणा प्रताप बैरागी, जिन्हें राणा बैरागी के नाम से भी जाना जाता , की उम्र 37 से 45 साल के बीच थी। वे जशोरे जिले के केशबपुर उप-जिले के अरुआ/अरुणा गाँव में रहते थे। वे अपने परिवार के साथ रहते थे, जिसमें उनके पिता तुषार कान्ति बैरागी भी शामिल थे, जो शिक्षक थे। राणा प्रताप एक आइस फैक्ट्री के मालिक थे और स्थानीय समाचार पत्र, दैनिक BD खबर के कार्यकारी संपादक के रूप में भी सेवा देते थे।

वे अपने गाँव में हिंदू अल्पसंख्यकों के अधिकारों के प्रति मुखर थे, जहाँ लगभग 100 हिंदू परिवार रहते हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, उनका अवामी लीग या अन्य वैचारिक संगठनों से भी संबंध था।

घटना का विवरण

5 जनवरी, 2026 (सोमवार) को शाम करीब 5:45 से 6:30 बजे के बीच जेसोर जिले के मनीरामपुर उपजिला के कपलिया/कोपलिया बाजार में राणा प्रताप बैरागी पर हमला किया गया। 3-4 अज्ञात हमलावरों, जिनमें से कुछ मोटरसाइकिल पर थे, ने उन्हें अपने बर्फ कारखाने से बाहर बुलाया और उन्हें पास के एक एकांत स्थान पर ले गए। वहां उसके सिर में कई बार गोली मारी गई और कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि उसके गले में चाकू भी मारा गया था। हमला इतना भयानक था कि राणा प्रताप मौके पर ही घायल हो गए और उनकी मौत हो गई। राणा प्रताप के पिता ने इस मामले में 10-12 अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था। 7 जनवरी, 2026 तक, कोई गिरफ्तारी नहीं हुई थी।

कथित फिरौती और सुरक्षा के पैसे

रिपोर्टों के अनुसार, रण प्रताप बैरागी पिछले कुछ महीनों से लगभग 3,00,000 बंग्लादेशी टका (लगभग ₹2.5–3 लाख) ‘सुरक्षा पैसे’ के रूप में दे रहे थे। कहा जाता है कि इस राशि की जबरन वसूली कुछ उग्रवादी या इस्लामिक गिरोहों द्वारा की जा रही थी। स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि हिंदू परिवारों से हर महीने ‘सुरक्षा कर’ देने को कहा जाता है, और यदि वे इसका पालन नहीं करते हैं तो उन्हें जान से मारने की धमकी दी जाती है। हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि ये दावे पुलिस या प्रशासन द्वारा आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं किए गए हैं।

क्या है प्रशासन और सरकार का रुख

बांग्लादेशी पुलिस और अंतरिम सरकार का कहना है कि राणा प्रताप बैरागी की हत्या धर्म या पत्रकारिता से संबंधित नहीं है। उनके खिलाफ पहले से ही कुछ आपराधिक मामले दर्ज थे। अधिकारियों के अनुसार, हत्या का मकसद व्यक्तिगत दुश्मनी, व्यावसायिक विवाद, या राजनीतिक संघर्ष हो सकता है। अब तक किसी भी संगठन ने इस घटना की जिम्मेदारी नहीं ली है।

राणा प्रताप बैरागी की हत्या उन 5–6 लगातार हत्याओं में से एक है, जो दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 के बीच हिंदू समुदाय से जुड़े लोगों की हुईं। उसी दिन, एक अन्य हिंदू व्यवसायी शरत/मणि चक्रवर्ती की हत्या की खबर भी आई। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद राजनीतिक अस्थिरता बढ़ गई है, और अस्थायी सरकार (मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में) के दौरान, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के बारे में चिंता गहराई है। भारत और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने भी इस मामले को लेकर चिंता व्यक्त की है।

राणा प्रताप बैरागी की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि यह अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, राजनीतिक अस्थिरता, और बांग्लादेश में कानून और व्यवस्था के बारे में गंभीर सवाल उठाती है। जबकि मीडिया और स्थानीय लोग इसे साम्प्रदायिक हिंसा और जबरन वसूली से जोड़ रहे हैं, बांग्लादेश प्रशासन इसे एक आपराधिक या व्यक्तिगत विवाद के रूप में देख रहा है। जब तक निष्पक्ष और पारदर्शी जांच पूरी नहीं होती, यह मामला संदेह, भय और विरोधाभासी दावों में उलझा रहेगा।

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