केमिकल-मुक्त सिंदूर के लिए आंदोलन चला रहे हैं, अब लाखों कमा रहे हैं और गांव को रोजगार दे रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के अशोक तपस्वी ने 12 साल पहले, 2013 में, उन्होंने महाराष्ट्र के पुणे में अपनी आरामदायक जॉब छोड़ दी और पैतृक गांव लौट आए। वजह? अपनी बंजर पड़ी 100 एकड़ जमीन को हरा-भरा बनाना और कुछ ऐसा करना जो न सिर्फ कमाई दे, बल्कि समाज को भी फायदा पहुंचाए। आज, 29 दिसंबर 2025 को, वो भारत के पहले ‘ऑर्गेनिक सिंदूर फार्म’ के मालिक हैं – वो भी उसी बंजर जमीन पर, जहां पहले कुछ नहीं उगता था!
अशोक की कहानी शुरू हुई एक छोटे से प्रयोग से। महाराष्ट्र के जंगलों में घूमते हुए उन्होंने अनाट्टो (Bixa orellana) नाम के पेड़-पौधे को देखा, जिसके बीजों से प्राकृतिक लाल रंग निकलता है। यही रंग इस्तेमाल होता है सिंदूर बनाने में – वो सिंदूर जो हिंदू संस्कृति में सौभाग्य का प्रतीक है। लेकिन बाजार में बिकने वाला ज्यादातर सिंदूर? वो तो केमिकल्स से भरा पड़ा है – लेड, मरकरी जैसे जहरीले तत्व जो स्किन प्रॉब्लम्स, एलर्जी और यहां तक कि कैंसर तक का खतरा पैदा करते हैं। अशोक को ये बर्दाश्त न हुआ। “मैं चाहता हूं कि हर औरत सुरक्षित सिंदूर लगाए, बिना किसी नुकसान के,” कहते हैं वो।
लौटते ही उन्होंने बंजर जमीन पर अनाट्टो के पौधे लगाने शुरू कर दिए। शुरुआत मुश्किल थी – पानी की कमी, मिट्टी की खराबी, लेकिन अशोक ने हार नहीं मानी। ऑर्गेनिक तरीके अपनाए: जैविक खाद, ड्रिप इरिगेशन, और लोकल किसानों को जोड़ा। आज उनका फार्म हरा-भरा है, 100 एकड़ में फैला हुआ। अनाट्टो के बीजों से निकाला जाने वाला प्राकृतिक रंग न सिर्फ सिंदूर बनाता है, बल्कि कॉस्मेटिक्स, फूड कलरिंग और दवाओं में भी यूज होता है। कमाई? हर साल लाखों रुपये! एक किलो अनाट्टो बीज 500-800 रुपये में बिकता है, और उनका उत्पादन इतना कि एक्सपोर्ट तक हो रहा है।
लेकिन अशोक रुकते कहां हैं? वो केमिकल-युक्त सिंदूर के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। सोशल मीडिया पर कैंपेन, लोकल मीटिंग्स, और जागरूकता वर्कशॉप्स – सब कुछ। “केमिकल सिंदूर स्किन को जला देता है, बच्चों और महिलाओं के लिए खतरा है। हमें ऑर्गेनिक की तरफ बढ़ना होगा,” उनकी अपील है। उनका फार्म अब सिर्फ खेती का नहीं, बल्कि ट्रेनिंग सेंटर भी बन गया है। दर्जनों लोकल किसानों को रोजगार मिला, और कई ने खुद अनाट्टो की खेती अपनाई। फतेहपुर से बाहर भी किसान उनसे सीखने आते हैं। ये कहानी सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की है। अशोक कहते हैं, “पैसे कमाना आसान था पुणे में, लेकिन असली सुकून तो यहीं मिला – अपनी मिट्टी को छूने में।
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