पेपर कप में चाय पीने की बढ़ती आदत सेहत के लिए बन रही है बड़ा खतरा। कोरोना के बाद बढ़ा चलन, लेकिन विशेषज्ञ दे रहे हैं चेतावनी।
शहर के करोड़ों चाय-प्रेमी हर रोज़ एक ऐसी आदत को अपना रहे हैं, जो दिखने में भले ही साफ, स्वच्छ और आरामदायक लगे, लेकिन अंदर ही अंदर शरीर को नुकसान पहुंचा रही है। बात हो रही है पेपर कप में चाय पीने की, जिसका चलन न सिर्फ कुछ जिलों में, बल्कि देश के कई हिस्सों में बहुत तेज़ी से बढ़ा है।
कोरोना के समय साफ़, स्वच्छ और डिस्पोजेबल इस्तेमाल के नाम पर पेपर कप का इस्तेमाल बढ़ा, लेकिन अब विशेषज्ञ इसे एक उभरती महामारी के रूप में देख रहे हैं। आम लोग पेपर कप को सुरक्षित मानकर रोजाना कई बार चाय पी रहे हैं, जबकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय कुछ और ही कहानी पेश करती है।
प्रतिदिन शरीर में जा रहे हैं हजारों माइक्रो-प्लास्टिक कण
डॉक्टरों के अनुसार, एक पेपर कप से कम से कम 25 हजार माइक्रो-प्लास्टिक टुकड़े गर्म चाय या कॉफी के साथ शरीर में जा सकते हैं। यदि लोग दिन में तीन से चार कप चाय पीता है, तो यह संख्या रोज करीब 90 हजार और एक महीने में 25 लाख से भी अधिक हो जाती है।
ये प्लास्टिक अंश तुरंत असर नहीं दिखाते, लेकिन काफी समय बाद हार्मोनल असंतुलन, नर्वस सिस्टम से जुड़ी समस्याएं और यहां तक कि कैंसर जैसी बढ़ी बीमारियों की वजह बन सकते हैं।
क्यों खतरनाक है पेपर कप?
दरअसल, पेपर कप पूरी तरह कागज से नहीं बने होते है। इनमें अंदर से पॉलीइथिलीन और अन्य केमिकल की पतली परत चढ़ाई जाती है, ताकि यह लीक-प्रूफ बनाने। जैसे ही इसमें गर्म चाय या कॉफी डाली जाती है, यह परत टूटने लगती है और माइक्रो-प्लास्टिक के रूप में पेय में घुल जाती है।
डॉक्टरों का कहना है कि आम व्यक्तियों के लिए यह पहचान पाना लगभग नामुमकिन है कि कप के अंदर किस तरह के केमिकल का इस्तेमाल किया गया है। यही वजह है कि खतरा और भी बढ़ जाता है।
क्यों दी डॉक्टरों ने चेतावनी?
सीएस डॉ. अनिल कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, मोटे कागज वाले कई कपों में मोम की परत होती है। जिससे गर्म पेय डालते ही यह मोम पिघलने लगता है और चाय या कॉफी के साथ शरीर में पहुंच जाता है।
उन्होंने बताया कि इसका सीधा असर किडनी और लीवर पर पड़ता है। लंबे समय तक ऐसा करने से गंभीर शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं। डॉक्टरों ने सलाह दी है कि गर्म जल पदार्थ हमेशा कुल्हड़, कांच, स्टील या मिट्टी के कप में ही पीने चाहिए।
शहर में बढ़ता कारोबार, घटती जागरूकता
कोरोना समय से पहले शहरों में ज्यादातर जगहों पर चाय की दुकानों और होटलों में स्टील या कांच के गिलास का इस्तेमाल करना आम था। अब उनकी जगह सिंगल यूज पेपर कप ने ले ली है। दुकानदारों के अनुसार, शहर में प्रतिदिन हजारों से लाखों पेपर कप की खपत हो रही है। एक चाय की टपरी भी रोज लगभग 150 से 200 कप का इस्तेमाल कर लेती है।
हैराना करने वाली बात यह है कि शहर की केवल करीब 10 प्रतिशत चाय दुकानों में ही अब कुल्हड़ या स्टील के कप में चाय मिलती है। बाकी दुकानें पूरी तरह पेपर कप पर निर्भर हो चुकी हैं।
पर्यावरण के लिए भी खतरा
पेपर कप सिर्फ सेहत के लिए ही नहीं, बल्कि वातावरण के लिए भी नुकसानदायक हैं। ये कप आसानी से नष्ट नहीं होते, कचरे के ढेर में सालों-साल तक पड़े रहते हैं। जलाने पर जहरीली गैसें निकलती हैं, जिससे हवा, मिट्टी और जल स्रोत सभी प्रभावित होते हैं।
क्या है सुरक्षित विकल्प?
डॉक्टरों की राय है कि स्टील, कांच, चीनी मिट्टी या कुल्हड़ के कप में चाय पीना सबसे सुरक्षित उपाय है। सिंगल-यूज़ डिस्पोज़ेबल का इस्तेमाल कम करना चाहिए। उपभोक्ताओं में जागरूकता की आवश्यकता है।
सुविधा के नाम पर अपनाई गई यह छोटी-सी आदत आने वाले समय में बड़ी बीमारी का कारण बन सकती है। अब समय है कि लोग स्वाद के साथ-साथ सेहत का भी ख्याल रखें।
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