कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स: गोस्वामी तुलसीदास जयंती पर अमेरिका में पहली बार तुलसी जयंती महोत्सव आयोजित किया गया। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सैंडर्स थिएटर में हुए इस ऐतिहासिक समारोह का आयोजन मोरारी बापू की नौ दिवसीय रामकथा ‘मानस गुरु प्रसाद’ के अंतर्गत किया गया।
पहली बार भारत से बाहर आयोजित तुलसी जयंती समारोह में तुलसी, व्यास, वाल्मीकि और रत्नावली पुरस्कार भी प्रदान किए गए। ये पुरस्कार वर्ष 2010 से गुजरात के तलगाज़रडा में उन लोगों को दिए जा रहे हैं, जिन्होंने रामचरितमानस और रामकथा की परंपरा को आगे बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
मोरारी बापू द्वारा 16 वर्ष पहले शुरू की गई यह परंपरा गोस्वामी तुलसीदास की साहित्यिक और आध्यात्मिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
Harvard University में तुलसी जन्मोत्सव
19 अगस्त 2026 को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में आयोजित तुलसी जन्मोत्सव और ग्लोबल अवॉर्ड्स समारोह ने भारतीय साहित्य, अध्यात्म और संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दी। समारोह में नौ विद्वानों, आध्यात्मिक नेताओं और सांस्कृतिक योगदानकर्ताओं को आठ प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रदान किए गए।
वाल्मीकि पुरस्कार यूसी बर्कले के प्रो. सैली जे. सदरलैंड गोल्डमैन और प्रो. रॉबर्ट गोल्डमैन को संयुक्त रूप से तथा ओसाका यूनिवर्सिटी की प्रो. मडोका फुकुओका को प्रदान किया गया।
व्यास पुरस्कार कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रो. जॉन स्ट्रैटन हॉले, डॉ. अश्विन भाई कांतिलाल राजगोर और आध्यात्मिक वक्ता देवी चित्रलेखा को दिया गया।
इसी क्रम में यूटी ऑस्टिन के प्रो. रूपर्ट स्नेल और सामुदायिक नेता पियूष भाई मेहता को तुलसी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वहीं, रत्नावली पुरस्कार हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रो. डायना एल. एक को तुलनात्मक धर्म एवं भारत अध्ययन में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रदान किया गया।
वैश्विक अकादमिक मंच पर गूंजी रामचरितमानस की आध्यात्मिक और साहित्यिक विरासत
तुलसी जयंती समारोह के दौरान हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में रामायण और रामचरितमानस की वैश्विक प्रासंगिकता को प्रमुखता से रेखांकित किया गया। अलग-अलग क्षेत्रों से आए पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं की भागीदारी ने भारतीय शास्त्रीय साहित्य, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं की विश्व स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता को उजागर किया।
समारोह में मोरारी बापू ने कहा, “पत्रं पुष्पं फलं — जैसे परमात्मा के चरणों में हम कुछ समर्पित करते हैं, पुष्प भी उसी ने खिलाए हैं, पत्र भी उसी ने टहनियों को दिए हैं, फल भी उसी ने लगाए हैं। फिर भी हम वही लेकर उसी को समर्पित करते हैं। मैं अपने हृदय के विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ।”
उन्होंने कहा कि भारत की व्यास पीठों और रामकथा परंपरा से जुड़े महान व्यक्तित्वों का सम्मान करना उनके लिए विशेष प्रसन्नता का विषय है। बापू ने सम्मानित व्यक्तित्वों के प्रति आभार जताते हुए कहा कि उनकी भावनाओं को समझने के लिए केवल शब्द पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उनकी आंखों और हृदय की अनुभूति भी महत्वपूर्ण है।
तुलसी जन्मोत्सव के जरिए वैश्विक मंच तक पहुंचा रामचरितमानस का संदेश
पावन पोपट ओबीई ने कहा कि मोरारी बापू की रामकथा के केंद्र में मौजूद सत्य, प्रेम और करुणा का संदेश किसी एक देश, धर्म या संस्कृति तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, स्वीकार, आनंद और प्रेम की भावना सार्वभौमिक है और यह अलग-अलग भौगोलिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को जोड़ने की क्षमता रखती है।
उन्होंने कहा कि तुलसी जन्मोत्सव और इसके प्रतिष्ठित पुरस्कारों को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी तक लाना रामकथा की इसी वैश्विक यात्रा का अगला चरण है। यह आयोजन रामचरितमानस की कालातीत ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के बीच पहुंचाने का माध्यम बना है, जहां इसके मानवीय मूल्यों और आदर्शों के प्रति रुचि लगातार बढ़ रही है।
तलगाज़रडा से हार्वर्ड तक पहुंची तुलसी जयंती की परंपरा
तुलसी जयंती पुरस्कारों की शुरुआत मोरारी बापू ने 2010 में की थी। इसका उद्देश्य रामकथा और रामचरितमानस की परंपरा के संरक्षण, व्याख्या और प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को सम्मानित करना था। इसके बाद गुजरात के तलगाज़रडा में हर वर्ष तुलसी जन्मोत्सव के अवसर पर संतों, विद्वानों, कथाकारों और अन्य विशिष्ट योगदानकर्ताओं को सम्मानित किया जाता रहा।
वर्ष 2026 इस परंपरा के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना, जब पहली बार तुलसी जन्मोत्सव का आयोजन अमेरिका में हुआ। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुए इस आयोजन ने तुलसी जयंती पुरस्कारों को वैश्विक पहचान दिलाते हुए रामचरितमानस की परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच से जोड़ा।
ग्रामीण क्षेत्र में तीन श्रोताओं से हार्वर्ड तक, मोरारी बापू की रामकथा की वैश्विक यात्रा
मोरारी बापू ने पिछले छह दशकों में रामकथा को भारत से लेकर दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाया है। रामायण के प्रसिद्ध व्याख्याता के रूप में उनकी कथाओं का आधार धर्मग्रंथ हैं, जबकि उनका संदेश शांति, सत्य, प्रेम और करुणा जैसे सार्वभौमिक मूल्यों पर केंद्रित रहता है। वे विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोगों को रामकथा से जुड़ने के लिए आमंत्रित करते हैं।
रामचरितमानस के वाचन की उनकी यात्रा 14 वर्ष की उम्र में शुरू हुई, जब उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में केवल तीन लोगों के सामने पहली कथा कही थी। दशकों बाद उनकी रामकथा श्रीलंका, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, केन्या, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया, इज़राइल और जापान सहित कई देशों तक पहुंच चुकी है।
मोरारी बापू ने रामकथा को समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचाने पर भी जोर दिया है। उन्होंने सेक्स वर्कर्स, ट्रांसजेंडर समुदाय और अन्य हाशिए पर रहने वाले सामाजिक समूहों के लिए भी रामकथा के आयोजन किए हैं। इसके अलावा, भारत और विदेशों में आपदा एवं संकट प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों से उनका जुड़ाव रहा है, जिसमें युद्धग्रस्त यूक्रेन भी शामिल है।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में तुलसी जयंती का आयोजन इस लंबी वैश्विक यात्रा को एक नया आयाम देता है। यह कार्यक्रम गोस्वामी तुलसीदास की साहित्यिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करते हुए रामचरितमानस के काव्य, कथा और आध्यात्मिक चिंतन को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास है।
