1921 में हुए शाही दौरे ने बदल दी दिल्ली की तस्वीर—जानिए कैसे जंगल से बना भारत का सबसे प्रतिष्ठित बाजार।
अगर आप दिल्ली में रहते हैं या यहां कभी घूमने आए हैं, तो ‘कनॉट प्लेस’ यानी Connaught Place का नाम जरूर सुना होगा। सफेद रंग की औपनिवेशिक इमारतें, गोलाकार बाजार, भीड़भाड़ भरी गलियां, ब्रांडेड शो-रूम, और स्ट्रीट फूड की खुशबू—सब कुछ यहां एक साथ मिलता है। यह जगह सिर्फ खरीदारी या घूमने-फिरने का ठिकाना नहीं, बल्कि दिल्ली का धड़कता हुआ दिल है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस जगह का नाम आखिर ‘कनॉट प्लेस’ क्यों पड़ा?
बहुत कम लोग जानते हैं कि इस नाम के पीछे एक दिलचस्प शाही इतिहास छिपा हुआ है, जो ब्रिटेन के राजघराने से सीधे जुड़ा है। तो आइए, जानते हैं उस कहानी को, जिसने इस ऐतिहासिक बाजार को ‘कनॉट प्लेस’ बना दिया।
‘कनॉट प्लेस’ नाम में छिपी है शाही गूंज
‘Connaught’ नाम सुनते ही एक अंग्रेजी शान और ठाठ का एहसास होता है, और यह यूं ही नहीं है। दरअसल, इसका नाम किसी भारतीय व्यक्ति या जगह के नाम पर नहीं रखा गया था। यह नाम आया था ब्रिटेन के शाही परिवार से।
“Connaught” असल में आयरलैंड के चार प्रांतों में से एक सबसे छोटे प्रांत का नाम है। ब्रिटिश काल में, यह शब्द शाही उपाधि के रूप में भी इस्तेमाल होता था। ब्रिटिश राज के दौरान, जब दिल्ली को नई राजधानी के रूप में विकसित किया जा रहा था, तब इस नए और भव्य बाजार को नाम देने का विचार आया।
यह नाम चुना गया था ‘ड्यूक ऑफ कनॉट एंड स्ट्रैथर्न’ की उपाधि से प्रेरित होकर — और यह उपाधि धारण करने वाले व्यक्ति थे प्रिंस आर्थर, जो क्वीन विक्टोरिया के तीसरे पुत्र और किंग जॉर्ज VI के चाचा थे।
1921 की वो शाही यात्रा जिसने बदल दिया दिल्ली का नक्शा
साल 1921 में, प्रिंस आर्थर भारत के दौरे पर आए थे। उनके भारत आगमन को यादगार बनाने और ब्रिटिश राज की निष्ठा दिखाने के लिए, अंग्रेजी सरकार ने उस समय बन रहे इस भव्य बाजार का नाम उनके नाम पर रख दिया — Connaught Place।
उस दौर में नई दिल्ली का निर्माण जोरों पर था, और यह इलाका ब्रिटिश वास्तुकला के एक आदर्श उदाहरण के रूप में विकसित किया जा रहा था। इस गोलाकार बाजार की डिजाइन ब्रिटिश आर्किटेक्ट रॉबर्ट टोर रसेल (Robert Tor Russell) ने तैयार की थी। उन्होंने इसे इस तरह बनाया कि यह यूरोपीय शहरों के हाई स्ट्रीट मार्केट जैसा लगे — सुरुचिपूर्ण, सुसंगठित और पूरी तरह से आधुनिक।
कहा जाता है कि कनॉट प्लेस को डिजाइन करते समय लंदन के रॉयल क्रेसेंट (Royal Crescent, Bath) से प्रेरणा ली गई थी। यही वजह है कि इसकी गोलाकार संरचना और दोहरी मंजिल वाली सफेद इमारतें इसे एक क्लासिक औपनिवेशिक पहचान देती हैं।
कनॉट प्लेस बनने से पहले कैसी थी यह जगह?
आज जहां हजारों लोग खरीदारी, कॉफी और सेल्फी के लिए जुटते हैं, वहां कभी माधोगंज, जयसिंहपुरा और राजा का बाजार नाम के छोटे-छोटे गांव हुआ करते थे। लगभग 100 साल पहले, यह पूरा इलाका घने कीकर के पेड़ों से भरा जंगल था। यहां हिरण और जंगली सूअर तक पाए जाते थे।
जब ब्रिटिश सरकार ने नई दिल्ली का निर्माण शुरू किया, तो इन गांवों को हटा दिया गया और इस क्षेत्र को पूरी तरह से एक आधुनिक बाजार के रूप में विकसित किया गया। लोगों को मुआवजा देकर या विस्थापित कर, यहां एक नया ‘दिल्ली का दिल’ बसाया गया — जो आगे चलकर ‘कनॉट प्लेस’ कहलाया।
ब्रिटिश ठाठ से लेकर देसी दिल तक
समय बीतने के साथ, कनॉट प्लेस ने खुद को बदलते हुए देखा। जो जगह कभी सिर्फ ब्रिटिश अफसरों और राजसी लोगों के आने-जाने का केंद्र हुआ करती थी, वहीं अब दिल्ली की पहचान बन चुकी है। आज यहां भारतीय और विदेशी ब्रांड्स, कला दीर्घाएं, रेस्तरां, और थिएटर हैं। रात को जब सीपी की सड़कों पर लाइट्स जगमगाती हैं, तो ऐसा लगता है मानो यह जगह अब भी अपने उस शाही इतिहास की कहानी फुसफुसा रही हो — एक ऐसी कहानी, जो दिल्ली के हर धड़कते दिल में बस चुकी है।
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