भारत के लिए अग्नि-5 MIRV मिसाइल: गेम-चेंजर होने की क्यों है संभावना, वैज्ञानिकों का ऐलान

अग्नि-5: एक ही मिसाइल से भी बेहतर विनाश का विकल्प, डॉ. सारस्वत ने बताया.

12 मार्च 2024 ,नई दिल्ली

डीआरडीओ के पूर्व महानिदेशक और वर्तमान में विज्ञान एवं प्रौद्योगकी विभाग के सदस्य डॉ. वीके सारस्वत अग्नि-5 MIRV मिसाइल के निर्माण कार्यों में शामिल रहे हैं। अग्रिन-5 एमआईआरवी की पहली उड़ान को लेकर डॉ. वीके सारस्वत ने कहा, “अग्नि-5 MIRV, ऐतिहासिक बैलिस्टिक हथियार प्रणाली, भारत की हमला करने की क्षमता को अगले स्तर पर ले जाने में सक्षम है, जिससे इसे “उच्च क्षमता और बेहतर प्रभाव” का दर्जा मिलता है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन द्वारा 10 वर्षों में विकसित की गई इस मिसाइल ने सोमवार को अपनी पहली उड़ान भरी है। इस मिसाइल ने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत के लिए गेम चेंजर का काम किया है। जब पूछा गया कि भारत के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम में यह हथियार क्या भूमिका निभाएगा तो इस पर डॉ. सारस्वत ने एनडीटीवी से कहा, “फोर्स मल्टीप्लायर होने के कारण इस हाथियार का “प्रभाव का दायरा” बढ़ जाएगा। नई हाथियार प्रणाली मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल (एमआईआरवी) तकनीक पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि एक ही मिसाइल कई परमाणु हथियार तैनात कर सकती है और एक साथ विभिन्न स्थानों पर लक्ष्य को मार सकती है।

” डॉ. सारस्वत ने कहा, “यह एक ही मिसाइल से भी बहुत बेहतर विनाश कर सकती है। भविष्य में दुश्मन के हमले के खिलाफ लॉन्च की जाने वाली मिसाइलों की संख्या को इसकी मदद से कम किया जा सकता है और इसे फोर्स मल्टीप्लायर कहा जाता है।” उन्होंने आगे कहा, “यह मिसाइल प्रौद्योगिकी, नियंत्रण, मार्गदर्शन, परिशुद्धता की दृष्टि से एक प्रमुख तकनीक है।” अग्नि-5 एमआईआरवी अधिक प्रभाव उत्पन्न करने के लिए छोटे आकार के वॉरहेड का उपयोग करता है।

डॉ. सारस्वत ने इसे परमाणु प्रौद्योगिकी की “विकासवादी प्रक्रिया” बताया और कहा कि भारत इसमें “कहीं से भी पीछे नहीं” है। अग्नि-5 एमआईआरवी के सफल परीक्षण की सोमवार शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सराहना की। उन्होंने कहा “मिशन दिव्यास्त्र के लिए हमारे डीआरडीओ वैज्ञानिकों पर गर्व है।” एक्स पर एक पोस्ट करते हुए पीएम मोदी ने लिखा, “मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) तकनीक के साथ स्वदेशी रूप से विकसित अग्नि-5 मिसाइल का पहला उड़ान परीक्षण ‘मिशन दिव्यास्त्र’ के लिए हमारे डीआरडीओ वैज्ञानिकों पर गर्व है।” बता दें कि यह तकनीक वर्तमान में अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस और चीन सहित कुछ मुट्ठी भर देशों के पास ही है।

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