कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स: मोरारी बापू की ‘मानस गुरु प्रसाद’ राम कथा ने रविवार को हार्वर्ड विश्वविद्यालय के सैंडर्स थिएटर में नौ दिनों के बाद विराम लिया। इस दौरान रामचरितमानस, भारतीय दर्शन और साहित्य पर आध्यात्मिक तथा अकादमिक चर्चा हुई।
समापन समारोह में बापू ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण ग्रंथों को संरक्षित करने का अनुरोध किया। उन्होंने चारों वेदों, रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण की प्रतियों को सुरक्षित रखने की अपील की। उनका कहना था कि इससे भविष्य के शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को इन ग्रंथों का अध्ययन करने में मदद मिलेगी।
‘मानस गुरु प्रसाद’ ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और पश्चिमी अकादमिक जगत के बीच संवाद का अवसर दिया। कार्यक्रम में कथा, संगीत, विद्वत् चर्चा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की शास्त्रीय विरासत को सामने रखा गया।
तुलसी जयंती के अवसर पर 19 अगस्त को तुलसी जन्मोत्सव और ग्लोबल अवॉर्ड्स समारोह भी हुआ। इस कार्यक्रम की खास बात यह रही कि राम कथा की 16 साल की परंपरा में पहली बार भारत से बाहर चार श्रेणियों में पुरस्कार दिए गए।
नौ लोगों को कुल आठ पुरस्कार प्रदान किए गए। प्रो. सैली जे. सदरलैंड गोल्डमैन, प्रो. रॉबर्ट पी. गोल्डमैन और प्रो. मडोका फुकुओका को वाल्मीकि पुरस्कार मिला। प्रो. जॉन स्ट्रैटन हॉले, डॉ. अश्विन भाई कांतीलाल राजगोर और देवी चित्रलेखा को व्यास पुरस्कार दिया गया।
प्रो. रूपर्ट स्नेल और पीयूष भाई मेहता को तुलसी पुरस्कार मिला। हार्वर्ड की प्रो. डायना एल. एक को तुलनात्मक धर्म के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए रत्नावली पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
16 से 18 अगस्त तक आयोजित विद्वत् वार्ताओं में जापान, नीदरलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका के विद्वानों ने भाग लिया। उन्होंने भारतीय साहित्य, दर्शन और संस्कृति से जुड़े विषयों पर चर्चा की।
बापू ने कहा, “मैं पढ़ने नहीं आया, मैं पढ़ाने नहीं आया; मैं प्रसाद बाँटने आया हूँ।”
आयोजन के मुख्य आयोजक पावन पोपट OBE ने कहा कि नौ दिनों में अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग ज्ञान, सीखने और खुले संवाद की भावना के साथ एकत्र हुए।
